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होर्मूज जलसंधि को खोलने के लिए ब्रिटेन की बुलायी मेगा बैठक में भारत लेगा हिस्सा! क्या अमेरिका होगा शामिल?

ब्रिटेन के विदेश सचिव की अध्यक्षता में यह बैठक होगी जिसमें भारत समेत 30 से 35 देश शामिल होंगे।

By Moumita Bhattacharya

Apr 02, 2026 20:59 IST

अवरुद्ध पड़े होर्मूज जलसंधि (Strait of Hormuz) को खोलने के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए ब्रिटेन ने एक मेगा वर्चुअल बैठक बुलायी गयी। यह बैठक गुरुवार (2 अप्रैल) को बुलायी गयी है। इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री केईर स्टार्मर (Keir Starmer) ने बताया कि ब्रिटेन के विदेश सचिव यवेट कूपर (Yvette Cooper) की अध्यक्षता में यह बैठक होगी। बैठक में फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा समेत 30 से 35 देश शामिल होंगे जिसमें भारत भी शामिल है।

इस बैठक का उद्देश्य कुटनैतिक तरीकों से होर्मूज जलसंधि से होकर 'फ्रीडम ऑफ नेविगेशन' यानी स्वतंत्र रूप से जहाजों की आवाजाही को फिर से शुरू करवाना है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि इस हाई प्रोफाइल बैठक से अमेरिका ने खुद को दूर रखा है। भू-राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर हमले के समय ब्रिटेन ने अमेरिका का समर्थन नहीं किया था। संभवतः इस वजह से ही दोनों देशों के बीच खटास आ गयी है।

बता दें, भारत इस वक्त अपनी जरूरत के हिसाब से करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है जिसमें से आधे से ज्यादा तेल पश्चिम एशिया से आता है और उसका एक बड़ा हिस्सा होर्मूज जलसंधि मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह मार्ग बेहद अहम माना जाता है।

सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि रसोई गैस के मामले में भी भारत काफी हद तक इस रास्ते पर ही निर्भर करता है। अपनी कुल जरूरत का लगभग 60% हिस्सा भारत आयात करता है जिसमें से करीब 90% प्रतिशत रसोई गैस होर्मूज जलसंधि के रास्ते ही आती है। वर्तमान तनाव की स्थिति की वजह से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है।

यह बैठक एक ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस रास्ते को खुला रखना उन देशों की जिम्मेदारी है जो इस पर निर्भर हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपने बयान में कहा कि बैठक में सभी कूटनीतिक और राजनीतिक विकल्पों पर चर्चा की जाएगी जिससे युद्धविराम के बाद जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को फिर से शुरू किया जा सकें। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस रास्ते को दोबारा खोलना आसान नहीं होगा। इसके लिए सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर प्रयास करने होंगे।

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