नई दिल्ली : भारत सरकार ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नियमों में आंशिक ढील देकर देश के स्टार्टअप क्षेत्र को राहत देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। उद्योग जगत और विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से वैश्विक निवेश फंडों के लिए भारत में निवेश करना आसान होगा और लंबे समय से चली आ रही मंजूरी संबंधी जटिलताएं कम होंगी। हालांकि इसे चीन के लिए पूरी तरह खुला दरवाजा नहीं माना जा रहा बल्कि अंतरराष्ट्रीय पूंजी को आकर्षित करने की व्यावहारिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
केंद्र सरकार ने हाल ही में प्रेस नोट-3 में संशोधन किया है। यह नया नियम 1 मई से लागू हो चुका है। इसके तहत यदि किसी विदेशी कंपनी, प्राइवेट इक्विटी फंड या वेंचर कैपिटल फंड में चीन या हांगकांग से जुड़ी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है और संबंधित क्षेत्र में ऑटोमेटिक रूट के तहत एफडीआई की अनुमति है, तो ऐसी कंपनियां भी भारत में ऑटोमेटिक रूट से निवेश कर सकेंगी।
सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कैपिटल गुड्स और पॉलीसिलिकॉन जैसे उत्पादन आधारित क्षेत्रों में निवेश प्रस्तावों के निपटारे के लिए 60 दिनों की तय समयसीमा भी निर्धारित की है। इससे निवेश मंजूरी प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य संघर्ष के बाद भारत ने पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर सख्त निगरानी शुरू की थी। इसी के तहत प्रेस नोट-3 लागू किया गया था लेकिन बाद में यह देखा गया कि केवल चीनी फंड ही नहीं बल्कि कई अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड भी प्रभावित हो रहे थे क्योंकि उनके सहयोगी निवेशकों में मामूली चीनी हिस्सेदारी होने पर भी लंबी मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा था।
भारत के स्टार्टअप क्षेत्र में चीनी निवेश एक समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। वर्ष 2016 में चीनी निवेश करीब 459 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2019 तक बढ़कर 3.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर पहुंच गया। अलीबाबा और टेनसेंट जैसी कंपनियों ने पेटीएम, ओला, जोमैटो, स्विगी, बिगबास्केट, बायजूस और उड़ान जैसे भारतीय स्टार्टअप्स में निवेश किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि इन निवेशों ने केवल पूंजी उपलब्ध नहीं कराई, बल्कि स्टार्टअप्स की वैल्यूएशन बढ़ाने, प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और तेजी से कारोबार विस्तार में भी अहम भूमिका निभाई।
कॉरपोरेट गवर्नेंस विशेषज्ञ श्रीराम सुब्रह्मण्यम के अनुसार कई स्तरों वाले फंड ढांचे में वास्तविक मालिकाना हक की पहचान करना अभी भी चुनौती बना हुआ है। हालांकि उन्होंने भारत की बैंकिंग और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग व्यवस्था को काफी मजबूत बताया।
वहीं कानूनी विशेषज्ञ सलमन वारिस का कहना है कि नए नियमों से निवेश समझौतों को पूरा करने की गति 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इस नीति के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। एक ओर प्रत्यक्ष चीनी निवेश पर नियंत्रण बनाए रखा जा रहा है वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय पूंजी के प्रवाह में अनावश्यक बाधाएं कम की जा रही हैं। सरकार अब विदेशी निवेश को आकर्षित कर घरेलू वैल्यू एडिशन और विनिर्माण क्षमता बढ़ाने पर अधिक जोर दे रही है। जानकारों के मुताबिक यह नई नीति आने वाले समय में भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम पर बड़ा असर डाल सकती है।