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दुर्लभ खनिजों की बढ़ती मांग पर वेदांता की चेतावनी, भारत को आत्मनिर्भर बनने की सलाह

होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच अनिल अग्रवाल बोले- खनन, ऊर्जा और संसाधन परियोजनाओं को तेजी से जमीन पर उतारना जरूरी

By श्वेता सिंह

May 09, 2026 18:48 IST

नई दिल्लीः पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर मंडराते संकट के बीच वेदांता समूह ने भारत को प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बनने की जरूरत पर जोर दिया है। कंपनी का कहना है कि ऊर्जा और खनिजों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में भारत की आर्थिक स्थिरता और औद्योगिक विकास के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है।

वेदांता समूह ने अपने मीडिया ब्रीफ में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की परिस्थितियों ने दुनिया को एक बार फिर यह याद दिलाया है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था कितनी सीमित और संवेदनशील है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा ऐसे समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है जो भू-राजनीतिक तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।

कंपनी के अनुसार यदि इन मार्गों में थोड़े समय के लिए भी व्यवधान आता है तो इसका असर केवल तेल आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कीमतों में तेजी, सप्लाई अनिश्चितता और व्यापक आर्थिक दबाव के रूप में सामने आ सकता है।

वेदांता ने चेतावनी दी कि अब यह चुनौती केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों, क्लीन एनर्जी, बैटरी निर्माण और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स भी कुछ गिने-चुने देशों में केंद्रित होते जा रहे हैं। इससे आने वाले समय में वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सप्लाई जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।

कंपनी का मानना है कि भारत के पास प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चुनौती उन्हें समय पर खोजने, निवेश आकर्षित करने और उत्पादन में बदलने की गति है। मीडिया ब्रीफ में कहा गया कि देश में हाइड्रोकार्बन और खनिज संपदा की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है।

वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने कहा कि भारत के कुल आयात बिल का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में संसाधन परियोजनाओं और खनन परिसंपत्तियों को तेजी से संचालन में लाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बननी चाहिए।

उन्होंने सुझाव दिया कि भूमि अधिग्रहण को तकनीक आधारित और तेज बनाया जाए। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर व्यवस्था, समयबद्ध मंजूरियां और भरोसे पर आधारित सेल्फ-सर्टिफिकेशन सिस्टम लागू किए जाएं ताकि परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी कम हो सके।

अनिल अग्रवाल ने यह भी कहा कि खनन परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने के लिए व्यावसायिक रूप से टिकाऊ प्रीमियम ढांचा तैयार करना जरूरी है।

वेदांता के मुताबिक भारत में अब तक नीलाम किए गए लगभग 85 प्रतिशत खनन ब्लॉक संचालन शुरू नहीं कर सके हैं। कंपनी ने इसे देश के प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र में मौजूद बड़े “एक्जीक्यूशन गैप” का संकेत बताया।

गौरतलब है कि हाल ही में वेदांता समूह ने अपने कारोबार का पुनर्गठन पूरा किया है। 1 मई से लागू नई व्यवस्था के तहत कंपनी को पांच सेक्टर आधारित इकाइयों में विभाजित किया गया है। इनमें एल्युमिनियम, पावर, ऑयल एंड गैस, आयरन एंड स्टील और जिंक- कॉपर-क्रिटिकल मिनरल्स कारोबार शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक संसाधन प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना और सप्लाई चेन को मजबूत करना आने वाले वर्षों में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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