कोलकाता के पार्क सर्कस इलाके की सुहरावर्दी एवेन्यू रोड का नाम बदल दिया गया है। अब इस रोड का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड किया गया है। इस बाबत कोलकाता नगर निगम (KMC) की कमिश्नर स्मिता पांडे ने एक विज्ञप्ति जारी की है।
KMC के इस फैसले का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने KMC को धन्यवाद दिया है। पर आखिर कौन थे गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा जिनके नाम पर कोलकाता की इस सड़क का नाम रखा गया है?
बात आजादी से ठीक एक साल पहले की है। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 4 दिनों तक चले साम्प्रदायिक दंगों में करीब 10,000 से ज्यादा लोगों की जान चली गयी थी। कोलकाता के इतिहास में यह सबसे अधिक हिंसात्मक दौर था। इतिहासकार इसे 'विभाजन के दंगे' कहते हैं।
I commend the historic decision taken by the Kolkata Municipal Corporation, yesterday, on the solemn occasion of Paschimbanga Divas, which would be instrumental in rectifying a historical wrong.
” Suvendu Adhikari (@SuvenduWB) June 21, 2026
Suhrawardy Avenue will now be renamed as Gopal Mukherjee Road.
For decades, a major pic.twitter.com/eUmZj1msE9
बता दें, बंगाल साल 1905 में भी एक बार विभाजन का दर्द झेल चुका था। यह विभाजन धर्म के नाम पर हुआ था। विकीपेडिया से मिली जानकारी के अनुसार उस समय लॉर्ड कर्जन ने यह विभाजन किया था जिसमें पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम बहुसंख्यक) और पश्चिम बंगाल (हिंदु बहुसंख्यक) दो हिस्सों में बंटे थे।
मुस्लिम लीग के जन्म की बनी वजह
आज तक की मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार 1946 ही वह दौर था जब ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का जन्म हुआ था। इसके बाद अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की तरफ से 1946 में 'डायरेक्ट एक्शन डे' का आह्वान किया गया था जिसका मकसद ब्रिटिश के जाने के बाद अलग मुस्लिम देश की मांग पर जोर देना था।
देखते ही देखते भड़क उठे थे दंगे
कोलकाता में हिंदु और मुसलमानों के बीच बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसकी वजह से पूरे शहर में तबाही मच गयी थी। कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने सशस्त्र मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई न करने का भरोसा भी दिया था।
इस समय को 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग' कहा जाता है। इतिहासकार इस समय पुलिस और सेना पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हैं। इसी अराजकता के बीच गोपाल मुखर्जी उर्फ गोपाल पाठा की एंट्री हुई थी। उन्हें हीरो और विलेन दोनों माना जाता है।
बता दें, गोपाल मुखर्जी पेशे से कसाई थे, इसलिए लोग उन्हें गोपाल पाठा (बांग्ला में बकरा) कहकर बुलाते थे।
गोपाल मुखर्जी ने भारत विभाजन के समय निभायी थी अहम भूमिका Image : X/@Sumita327
हिंसा में निभाई थी अहम भूमिका
कहा जाता है कि गोपाल मुखर्जी के प्रयासों के वजह से बड़ी संख्या में हिंदुओं को मौत के घाट उतारे जाने से और महिलाओं को अपमानित होने से बचाया जा सका था।
दावा किया जाता है कि गोपाल मुखर्जी और उनके साथियों ने हिंदुओं पर हमला करने वालों को अपने निशाने पर लेना शुरू कर दिया था जिसके कारण बड़ी संख्या में मुसलमानों को शहर छोड़कर भागना पड़ा था। 20 अगस्त 1946 तक यह स्पष्ट हो चुका था कि कलकत्ता समेत बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का मुस्लिम लीग का सपना कभी पूरा नहीं होगा।
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महात्मा गांधी के आगे नहीं डाले हथियार
प्रभात खबर की मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि BBC के रिपोर्टर एंड्रयू व्हाइटहेड ने 1997 में गोपाल मुखर्जी का एक ऑडियो इंटरव्यू लिया था जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वह नहीं चाहते थे कि कोलकाता में दंगा फैले लेकिन उनके प्रयासों के बावजूद हिंसा हुई।
वह कहते हैं कि मैंने हिंसा रोकने की कोशिश भी की और अपने मुसलमान दोस्तों से कहा कि हम भाई-भाई की तरह रहते हैं और वैसे ही रहेंगे लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं मानी। इसके साथ ही 'लड़ के लेंगे पाकिस्तान' के नारे भी गूंजने लगे। इसके बाद ही उन्होंने अपने लोगों से तैयार रहने के लिए कहा। जब रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि दंगों में उन्होंने कितने लोगों को मारा तब उन्होंने कहा कि हमारे पास कोई लिस्ट थोड़े ही न है।
इंडियन एक्सप्रेस के एक इंटरव्यू के हवाले से दावा किया जाता है कि गोपाल मुखर्जी ने स्वीकार किया था कि जब हिंसा के बाद लोग अपने हथियार गांधी जी के पास जमा करा रहे थे, तब मैंने ऐसा नहीं किया। मैं हथियार अपने पास रखना चाहता था ताकि अपनी बहू-बेटियों की रक्षा कर सकूं। मैंने अपने लड़कों से कह दिया था कि वे दंगाईयों के अलावा किसी को भी निशाना न बनाएं। महिलाओं से कोई गलत हरकत न करें।