नई दिल्ली : पवन खेड़ा को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में उन्हें बड़ी राहत मिली है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भूइंया शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई मानहानि और कथित जालसाजी से जुड़े केस से संबंधित है।
मामले में आरोप है कि पवन खेड़ा ने एक पत्रकार सम्मेलन के दौरान यह दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास एक से अधिक पासपोर्ट हैं और उनके पास विदेशों में संपत्ति भी है। उन्होंने यह भी कहा था कि रिनिकी भूइंया शर्मा के पास संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और एंटीगुआ-बारबुडा जैसे देशों की नागरिकता या पासपोर्ट हो सकता है जिसे भारतीय कानून के तहत अवैध बताया गया था। इन आरोपों को रिनिकी भूइंया शर्मा और हिमंत बिस्वा सरमा ने पूरी तरह निराधार और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज किया और इसके बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई।
इस मामले में असम पुलिस ने आरोप लगाया कि पवन खेड़ा ने कथित रूप से गलत या जाली दस्तावेजों के आधार पर यह बयान दिया जिसके चलते उनके खिलाफ जालसाजी और मानहानि जैसी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया। इसके बाद यह मामला राजनीतिक रूप से भी गर्मा गया और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी बयानबाज़ी देखने को मिली।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद पवन खेड़ा ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। सुनवाई के दौरान उनके वकीलों ने दलील दी कि यह मामला मुख्यतः मानहानि से जुड़ा है जिसमें आम तौर पर गिरफ्तारी आवश्यक नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि पवन खेड़ा जांच में सहयोग करने को तैयार हैं और आरोपों के पीछे मजबूत आधार नहीं है।
वहीं असम सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और निष्पक्ष जांच के लिए पूछताछ आवश्यक है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे. के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर शामिल थे पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
हालांकि न्यायालय ने कुछ शर्तें भी निर्धारित की हैं। पवन खेड़ा को जांच में पूरा सहयोग करना होगा आवश्यकता पड़ने पर उपस्थित होना होगा और बिना न्यायालय की अनुमति के देश छोड़ने की अनुमति नहीं होगी। इन शर्तों के साथ अदालत ने उनके व्यक्तिगत अधिकारों और जांच प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है।
इस निर्णय के बाद पवन खेड़ा को तत्काल गिरफ्तारी से राहत मिल गई है और वह कानूनी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्र रूप से अपनी लड़ाई जारी रख सकेंगे। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह फैसला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह मामला पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ था।