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घुसपैठ और सीमा सुरक्षा : क्यों भारत की 'थ्री-डी' नीति है इतनी महत्वपूर्ण, समझे यहां

जिन लोगों के पास देश में रहने का वैध अधिकार नहीं है, उन्हें पहचान कर वापस भेजना ही इस नीति का मुख्य उद्देश्य है।

By संजय बसु

Jun 21, 2026 12:43 IST

हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में घुसपैठ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ को रोकने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कई वर्षों से सख्त रुख अपनाया है। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि घुसपैठियों को देश छोड़ना होगा।

इसे सख्ती से लागू करने के लिए 'थ्री-डी' नीति यानी डिटेक्ट (Detect), डिलीट (Delete) और डिपोर्ट (Deport) को प्रभावी तरीके से लागू करने की बात कही जा रही है।

जिन लोगों के पास देश में रहने का वैध अधिकार नहीं है, उन्हें पहचान कर वापस भेजना ही इस नीति का मुख्य उद्देश्य है। इस दृष्टिकोण से यह केवल निष्कासन-केंद्रित कोई साधारण नीति नहीं, बल्कि इसका लक्ष्य घुसपैठ को रोकने के लिए एक सुव्यवस्थित और समग्र प्रणाली विकसित करना है।

इसके तीन मुख्य चरण हैं- डिटेक्ट यानी घुसपैठियों की पहचान करना, डिलीट यानी वोटर लिस्ट से नाम हटाना और डिपोर्ट यानी उन्हें सीमा पार करवाकर उनके अपने देश वापस भेजना।

अवैध घुसपैठ के मामले में बांग्लादेश के साथ भारत की सीमा क्षेत्र सबसे संवेदनशील इलाके माने जाते हैं। इस पड़ोसी देश के साथ लंबी सीमा होने की वजह से भौगोलिक दृष्टि से पश्चिम बंगाल विशेष रूप से अधिक संवेदनशील स्थिति में है।

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बंगाल से सड़क मार्ग द्वारा सीमा पार कर बांग्लादेश की ओर जाने पर दोनों देशों की प्रशासनिक व्यवस्था और आर्थिक स्थिति में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। सड़कें, सीमा टर्मिनल, सार्वजनिक सेवाएं, व्यापारिक गतिविधियां और संबंधित बुनियादी ढांचे में यह अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। दोनों देशों की जनसंख्या, प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों तथा सरकारी व्यवस्थाओं पर दबाव की मात्रा भी अलग-अलग है।

भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में 140 करोड़ से अधिक लोगों को सेवाएं प्रदान की जाती हैं। यहां की सरकार पर जनकल्याण, रोजगार, आधारभूत ढांचे और पुलिस व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की बड़ी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में सीमावर्ती राज्यों के लिए यह चुनौती और अधिक बढ़ जाती है और इस परिस्थिति में किसी भी प्रकार की अवैध घुसपैठ स्थानीय संसाधनों पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

हालांकि पश्चिम बंगाल के मामले में समस्या केवल खुली सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व की सरकारों द्वारा सीमा संरचनाओं को समय पर प्राथमिकता न दिया जाना भी स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा देता है। बांग्लादेश के साथ पश्चिम बंगाल की लगभग 2,216.7 किलोमीटर लंबी सीमा है।

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अगस्त 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार इस सीमा के लगभग 569 किलोमीटर हिस्से में अभी तक कांटेदार तार की बाड़ नहीं लगाई जा सकी है। इनमें से लगभग 456 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है, जहां बिना किसी परेशानी के ही बाड़ लगाई जा सकती थी।


सीमा क्षेत्रों से अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को भेजा जा रहा वापस Image : ANI


केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार इस 456 किलोमीटर योग्य क्षेत्र में पूर्व की राज्य सरकार के कार्यकाल में केवल 77.9 किलोमीटर क्षेत्र में ही बाड़ लगाने के लिए भूमि उपलब्ध कराई गई थी। इससे ही यह स्पष्ट होता है कि सिर्फ भौगोलिक स्थिति या आबादी ही नहीं बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा का अभाव भी यहां बड़ी समस्या बन गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित केंद्र सरकार के नेताओं ने बार-बार कहा है कि केवल केंद्र की भाजपा सरकार का विरोध करने के लिए ही पूर्व की सरकार ने कई मामलों में असहयोग किया। हालांकि इस दृष्टिकोण से तत्कालीन प्रशासन के कई लोग सहमत भी रहे हैं।

इसके साथ यह भी कहा जाता है कि वामपंथी शासन के दौरान भी घुसपैठ के मुद्दे को उतनी प्राथमिकता नहीं दी गई, जितनी आज दी जाती है। हालांकि यह भी माना जाता है कि उस समय अवैध घुसपैठ की वर्तमान जैसी तीव्रता नहीं थी।

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आरोप यह भी लगाया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में घुसपैठियों के एक बड़े हिस्से को अवैध रूप से राशन कार्ड, आधार कार्ड और यहां तक कि पासपोर्ट जैसे दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, साथ ही उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ देकर एक स्थायी वोट बैंक में बदलने का प्रयास किया गया, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

पश्चिम बंगाल में नई भाजपा सरकार के समय में सीमा सुरक्षा को लेकर सहयोग की प्रक्रिया को अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। वर्तमान राज्य सरकार सीमा सुरक्षा के लिए BSF को भूमि उपलब्ध कराने और हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेजी से पूरा कर रही है।

रिपोर्टों में कहा गया है कि 5 जिलों में खरीदी गई लगभग 43 एकड़ भूमि के साथ-साथ करीब 32 एकड़ सरकारी खास भूमि पहले ही BSF को सौंप दी गई है। इसे सीमा सुरक्षा की दिशा में एक व्यावहारिक और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही केंद्र और BSF के बीच समन्वय को भी और मजबूत किया जा रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में वर्ष 2023 में 1,547, वर्ष 2024 में 1,694 और वर्ष 2025 के जुलाई तक 723 अवैध घुसपैठियों को पकड़ा गया है। ऐसी स्थिति में सीमा पर कांटेदार तार लगाने और भूमि हस्तांतरण जैसी व्यवस्थाएं सुरक्षा को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार की 'थ्री-डी' नीति को समझना आवश्यक है। यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में अवैध घुसपैठ या अवैध प्रवासन से निपटने के लिए क्या किसी तरह का असंगत या अस्पष्ट दृष्टिकोण वास्तव में व्यावहारिक हो सकता है?


क्यों भारत की 'थ्री-डी' नीति और सीमा सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है? Image : ANI


समय के साथ देश के कानूनी ढांचे में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। 'इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025' ने आव्रजन से जुड़े पहले के विभिन्न कानूनों को कुछ संशोधनों के साथ एकीकृत कर दिया है। इस कानून में 'विदेशी' की परिभाषा दी गई है कि जो व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है, उसे विदेशी माना जाएगा। यह कानून किसी पड़ोसी देश या किसी समुदाय के प्रति वैमनस्य व्यक्त करने के बजाय एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक प्रक्रिया स्थापित करने का ढांचा प्रदान करता है।

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हर संप्रभु राष्ट्र के पास यह तय करने का अधिकार होता है कि कौन उसके देश में प्रवेश कर सकता है, कौन रह सकता है और किन शर्तों पर रह सकता है। भारत भी इस सिद्धांत का अपवाद नहीं है। वैध और अवैध प्रवासन के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने का उद्देश्य किसी के प्रति विरोधभाव रखना नहीं, बल्कि जिम्मेदार प्रशासन के लिए एक आवश्यक व्यवस्था बनाना है।

इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर, 2025 में अवैध घुसपैठियों की रोकथाम, पहचान, गतिविधियों पर नियंत्रण और उनके निर्वासन के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। इस ढांचे के तहत यह व्यवस्था की गई है कि किसी भी घुसपैठिए को 'डिपोर्ट' करने से पहले उसे होल्डिंग सेंटर या अस्थायी शिविर में रखा जाएगा।

ऐतिहासिक रूप से भारत में घुसपैठ की समस्या को अक्सर एक बदलते हुए स्थानीय मुद्दे के रूप में देखा गया, जिसके कारण इसे रोकने के लिए लंबे समय तक कोई समग्र और संगठित व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।

नया कानूनी ढांचा इसी कमी को काफी हद तक दूर करने का प्रयास करता है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि घुसपैठ रोकने के लिए राज्य किस प्रकार के कदम उठा सकता है और किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के पीछे क्या कानूनी आधार और तर्क होगा।

अंत में यह समझना आवश्यक है कि देश के संसाधनों का संरक्षण एक प्राथमिक जिम्मेदारी है, जो सिर्फ एक कागजी प्रशासनिक नारा नहीं हो सकता। देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, आवास, रोजगार और भूमि अभिलेख जैसी सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की जाती हैं।

अवैध घुसपैठ इन उद्देश्यों के मार्ग में एक बड़ी बाधा बन सकती है। यदि यह स्थिति एक सामान्य प्रवृत्ति बन जाए तो यह न केवल देश की सुरक्षा को प्रभावित करती है, बल्कि संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण में भी बाधा डालती है।

समाज के सबसे जरूरतमंद और कमजोर वर्ग के लोग ही सरकारी सेवाओं पर सबसे अधिक निर्भर रहते हैं। यदि किसी भी प्रकार से कानून की खामियों का लाभ उठाकर घुसपैठियों को भी इन सुविधाओं का लाभ मिलने लगे तो इसका सबसे अधिक नुकसान उन्हीं वंचित नागरिकों को उठाना पड़ता है।

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