आज, जब मैं 19 मई 2024 को शुरू हुई उस यात्रा के बारे में सोचता हूं- जब हमने टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से टाइडिंग्स मीडिया की ओर कदम बढ़ाया था- तो मुझे 20 महीने पहले के एक विशेष दिन की याद आती है। वह 15 अक्टूबर 2024 का दिन था। कोलकाता की सड़कें अभया से निर्मम दुष्कर्म और हत्या के बाद उसके लिए न्याय की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शनों से गूंज रही थीं।
उसी दिन विडंबना यह थी कि राज्य सरकार ने रेड रोड पर दुर्गा पूजा कार्निवल का भी आयोजन किया था। अभया के लिए न्याय मांग रहे प्रदर्शनकारियों को अपना ‘द्रोह कार्निवल’ आयोजित करने की अनुमति पाने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा था।
माननीय कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तत्कालीन राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए प्रदर्शनकारियों को न्याय की मांग के लिए सड़कों पर उतरने की अनुमति दी। यह एक अप्रत्याशित विरोधाभास था। एक ओर रोशनी से जगमगाते रेड रोड पर आयोजित दुर्गा पूजा कार्निवल में हजारों लोग जुटे थे, वहीं दूसरी ओर कई हजार लोग मोमबत्तियां लेकर शांतिपूर्ण मार्च में शामिल थे, उस हिंसक बलात्कार और हत्या के खिलाफ न्याय की मांग करते हुए।
उस दिन, 'एई समय' के पहले पन्ने पर दोनों खबरों को समान महत्व दिया गया था। पत्रकारिता की दृष्टि से दोनों घटनाओं को समाचार रिपोर्टों और तस्वीरों सहित समान स्थान मिला। हमने न तो किसी के प्रति पक्षपात दिखाया और न ही किसी के प्रति शत्रुता। हमने केवल पत्रकारिता के शाश्वत सिद्धांतों का पालन करते हुए संवेदनशील निष्पक्षता के साथ सही और तथ्यपरक समाचार पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किए।
शुरुआत से ही 'एई समय' ने इसे अपनी पेशेवर जिम्मेदारी माना है। मैं विशेष रूप से 15 अक्टूबर का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि यह उन परिस्थितियों का प्रतीक है, जिनके बीच 'एई समय' ने इन 20 महीनों में अपनी यात्रा जारी रखी है।
इसके बाद क्या हुआ, शायद पाठकों को पता भी नहीं है।
16 अक्टूबर 2024 को प्रकाशित 'एई समय' का संस्करण अगले ही दिन से 'एई समय' को राज्य सरकार के विज्ञापन मिलना बंद हो गए। यदि वास्तविक कारण बताया जाए सिर्फ इतना था कि दोनों खबरों को पहले पन्ने पर समान महत्व दिया गया था। इसके बावजूद 'एई समय' ने समाचारों में साहसिक निष्पक्षता के अपने मार्ग से हटना स्वीकार नहीं किया।
उसी वर्ष 14 दिसंबर को ‘हिमालय दर्पण’ हमारे सहयोगी प्रकाशन के रूप में जुड़ा। कुछ ही घंटों के भीतर वहां भी राज्य सरकार के विज्ञापन बंद कर दिए गए। रातों-रात शहर के विभिन्न हिस्सों से 'एई समय' के पोस्टरों वाले गार्डरेल जबरदस्ती हटा दिए गए। यहां तक कि राज्य सरकार के कार्यक्रमों के निमंत्रण, जो सामान्यतः सभी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों को भेजे जाते हैं, अचानक हमारे पास आना बंद हो गए।
ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या कोई सरकार इस तरह किसी विशेष समाचारपत्र को सार्वजनिक आयोजनों से अलग-थलग कर सकती है?
'एई समय' कोलकाता पुलिस की एक हाफ मैराथन का आधिकारिक साझेदार भी था। आयोजन से कुछ ही दिन पहले हमें उस साझेदारी से भी हटा दिया गया। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं।
इनमें से किसी भी मामले में कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया। कानूनी रूप से शायद कोई कारण दिया भी नहीं जा सकता था लेकिन कारण समझना मुश्किल नहीं था और यह अनुमान लगाना भी मुश्किल नहीं था कि इसके पीछे किसके निर्देश या संकेत काम कर रहे थे।
हम यह भी जानते हैं कि तत्कालीन सरकार के कई मंत्री एक सरल प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए-चाहे वह पार्टी नेतृत्व की नाराजगी के डर से हो या उसके प्रति अंधी निष्ठा के कारण।
प्रश्न यह था… जिस प्रकार किसी समाचारपत्र का कर्तव्य है कि वह निष्पक्ष रूप से समाचार प्रस्तुत करे, उसी प्रकार राज्य सरकार का भी दायित्व है कि वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशील, निष्पक्ष और दृढ़ रहे। फिर किस नैतिक आधार पर 'एई समय' को हर कदम पर वंचित किया जा रहा था?
हम सरकार से किसी आर्थिक सहायता की अपेक्षा नहीं कर रहे थे। हमारा प्रश्न केवल इतना था… एक राज्य सरकार निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति इतनी असहिष्णु क्यों थी?
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि किसी छोटे या बड़े नेता अथवा मंत्री ने इस मुद्दे पर बोलने का साहस नहीं दिखाया। बल्कि उस समय के एक मंत्री, जिनके पास कई विभागों की जिम्मेदारी थी, लेकिन जो अपने बहु-विभागीय कार्यों से अधिक कैमरों के सामने दिखाई देते थे, उन्होंने विभिन्न हलकों में यह संदेश तक पहुंचा दिया कि 'एई समय' को विज्ञापन देने से केवल ‘समस्याएं बढ़ेंगी’। कुछ अन्य लोगों ने धृतराष्ट्र की तरह आंखें मूंदे रहने की भूमिका निभाना ही उचित समझा।
इन सबके बावजूद हमने ईमानदारी, निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता के साथ समाचार प्रस्तुत करने की अपनी जिम्मेदारी निभाना जारी रखा क्योंकि हमारा विश्वास है कि कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली होती है।
पिछले 20 महीनों में हमने सचेत रूप से किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष में या विरोध में पक्षपातपूर्ण रुख अपनाने से परहेज किया है। हर कदम पर हमने अपने पाठकों के सामने संतुलित और निष्पक्ष सत्य प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
तत्कालीन राज्य सरकार ने चाहे जितनी तीव्रता से 'एई समय' को अलग-थलग करने या कमजोर करने की कोशिश की हो, हमने पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। हम और अधिक दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े और इसी प्रक्रिया में पहले से अधिक मजबूत बनकर उभरे।
लंबे अनौपचारिक बहिष्कार के बावजूद 'एई समय' लगातार आगे बढ़ता रहा। हमारे पाठकों की संख्या में भी वृद्धि हुई। नए संस्करण शुरू किए गए। यह समाचारपत्र पाठकों की सोच और आदतों में और भी गहराई से अपनी जगह बनाता गया।
जो एक बंगाली समाचारपत्र के रूप में शुरू हुआ था, वह समय के साथ अंग्रेज़ी और हिंदी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब लाइव तथा अन्य माध्यमों पर अपनी सशक्त और गतिशील उपस्थिति दर्ज कराने वाले एक व्यापक मीडिया मंच के रूप में विकसित हो गया।
जहां हमारे लिए कुछ दरवाज़े जानबूझकर बंद कर दिए गए, वहीं हमने निजी साझेदारियों, डिजिटल विस्तार और अपनी विश्वसनीयता की ताकत के बल पर अपने लिए नए अवसरों के द्वार स्वयं निर्मित किए।
लेकिन इन सबमें सबसे बड़ा बल हमारे पाठकों का अटूट विश्वास रहा है। विज्ञापन रोके जा सकते हैं, दृश्यता बाधित की जा सकती है लेकिन ईमानदारी से अर्जित विश्वास को इतनी आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकता।
शायद यही पिछले 20 महीनों का सबसे महत्वपूर्ण सबक है- सत्य के साथ खड़े रहने वाली संस्थाएं परखी जा सकती हैं लेकिन वे आसानी से टूटती नहीं हैं।
दबाव और प्रतिकूल परिस्थितियों के सामने न झुकने की 'एई समय' की यह दृढ़ता आज इसकी सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है।
और इसलिए आज बिना किसी कटुता, बिना किसी शत्रुता के लेकिन विनम्रता और दृढ़ विश्वास के साथ मैं केवल इतना कहना चाहता हूं- सत्य शक्ति के आगे नहीं झुकता और न ही हम झुकेंगे।