वाशिंगटन डी.सी. : डोनाल्ड ट्रम्प के अब्राहम समझौते को लेकर एक बार फिर पश्चिम एशिया की कूटनीति में हलचल तेज हो गई है। वर्ष 2020 में इजरायल और अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के उद्देश्य से शुरू किए गए इस समझौते को लेकर अब नए राजनीतिक दबाव और असंतुलन की स्थिति सामने आ रही है।
इन समझौतों का उद्देश्य इजरायल को केवल औपचारिक मान्यता देना ही नहीं था, बल्कि पारस्परिक सहयोग और कूटनीतिक संबंधों के नए रास्ते खोलना भी था। प्रारंभिक चरण में कुछ देशों ने इसमें भागीदारी की लेकिन सऊदी अरब के नेतृत्व में पश्चिम एशिया के एक बड़े हिस्से ने अब तक इस समझौते से दूरी बनाए रखी है और अपनी स्थिति पर कायम है।
इसी बीच डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया रुख ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। वह एक बार फिर विभिन्न देशों को अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे है जिससे क्षेत्रीय तनाव और कूटनीतिक असहजता बढ़ती दिखाई दे रही है।
इस दबाव के बीच पाकिस्तान एक कठिन स्थिति में आ गया है। एक ओर समझौते में शामिल होने से आर्थिक और भू-राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसे स्वीकार करना देश की लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति और जनभावनाओं के विपरीत माना जा रहा है। इजरायल को मान्यता देना फलस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान के ऐतिहासिक रुख से टकराता है।
सूत्रों के अनुसार सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के पासपोर्ट से जुड़ी कुछ तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए है जिनमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर सभी देशों के लिए मान्य है। इसी वजह से अब्राहम समझौते में शामिल होने के मुद्दे पर आंतरिक असहजता और बढ़ गई है।
बताया जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प पाकिस्तान के साथ-साथ ईरान को भी इस समझौते का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हुए कहा है कि यह समझौता पाकिस्तान के मौलिक सिद्धांतों के खिलाफ है और देश 78 वर्षों के इतिहास में इजरायल को कभी मान्यता नहीं दे सका है।
इस बीच यह भी चर्चा में है कि ट्रम्प ने अब्राहम समझौते को लेकर पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व का उल्लेख किया, जबकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। इस पर पाकिस्तान के भीतर यह सवाल उठने लगा है कि क्या देश की आंतरिक सत्ता संरचना में सेना की भूमिका प्रमुख है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर इस्लामाबाद की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।