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ओड़िशा की तैराक अंजली मुण्डा ने दिखाया सपना सच करने का जज्बा

सीमित संसाधनों के बावजूद 15 वर्षीय तैराक ने 200 मीटर फ्रीस्टाइल में भारत के लिए पहला स्वर्ण जीतकर किया इतिहास रचा।

By श्वेता सिंह

Mar 26, 2026 18:39 IST

रायपुर: ओड़िशा के जाजपुर जिले के गहिरागड़िया गांव की अंजली मुण्डा ने 11 साल की उम्र में जब पहली बार स्कूल के खेल वर्ग में तैराकी चुनी थी, तब शायद उसने खुद नहीं सोचा होगा कि भविष्य में वह राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतेगी। अंजली चार भाई-बहनों में सबसे छोटी है और उसके पिता एक स्थानीय फैक्ट्री में वैन ड्राइवर हैं। बचपन में उसने तैराकी को केवल खेल और पानी में मजा समझा, लेकिन कोई संगठित प्रशिक्षण नहीं था। 10 साल की उम्र में अंजली कलींग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) में दाखिल हुई जहां राज्य भर के आदिवासी छात्र निशुल्क शिक्षा और हॉस्टल की सुविधा पाते हैं।

शुरुआत में उसकी प्रेरणा उसकी बड़ी बहन थीं, जो तीरंदाजी में सक्रिय थी। हालांकि अंजली ने अपनी राह खुद चुनी और तैराकी में अपने कौशल को निखारने का फैसला किया। एक साल बाद स्थानीय क्लब टूर्नामेंट में उन्होंने अपनी मेहनत का पहला नतीजा देखा और सिल्वर मेडल जीतकर खुद पर विश्वास बढ़ाया।

अंजली ने कहा,“सिल्वर मेडल मेरे जीवन का पहला मेडल था और यह मेरे लिए बहुत खास था। इससे मुझे आत्मविश्वास मिला कि मैं खेल में अच्छा कर सकती हूं। मैं अपने कोच का धन्यवाद देना चाहती हूं जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया और मेरी ट्रेनिंग में पूरा मेहनत की।”

इस मेहनत का फल अंजली को खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 (Khelo India Tribal Games 2026) में मिला, जहां उन्होंने 200 मीटर फ्रीस्टाइल में 2:39:02 का समय लेकर भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता। अगर अंजली ने यह प्रदर्शन नहीं किया होता, तो कर्नाटक की टीम उद्घाटन दिवस पर सभी छह स्वर्ण पदक अपने नाम कर सकती थी।

अंजली का मानना है कि उनके सफर में खेल मंत्रालय की पहल जैसे ASMITA लीग (Achieving Sports Milestone by Inspiring Women Through Action) ने भी अहम भूमिका निभाई। 2024 में उन्होंने संबलपुर में आयोजित खेलो इंडिया अस्मिता लीग में दो सिल्वर मेडल जीते और अन्य दो इवेंट्स में पेडस्टल के करीब रहीं। इन उपलब्धियों ने उन्हें बड़े टूर्नामेंट में खुद पर विश्वास दिलाया।

हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित खेलो इंडिया अस्मिता स्वीमिंग लीग (East Zone) में भी अंजली ने दो सिल्वर मेडल जीते। फिर उसी फॉर्म को लेकर वह रायपुर आई और राष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला स्वर्ण हासिल किया।

हालांकि अंजली अपने प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी क्योंकि उसका लक्ष्य व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय 2:25 सेकंड से बेहतर करना था। अब अंजली का ध्यान बाकी इवेंट्स पर है: महिला 50 मीटर बैकस्ट्रोक, महिला 100 मीटर बैकस्ट्रोक और 200 मीटर इंडिविजुअल मेडली।

अंजली की कहानी न केवल उसके व्यक्तिगत संघर्ष और मेहनत की मिसाल है, बल्कि यह आदिवासी युवाओं के लिए भी प्रेरणा है कि सीमित संसाधन कभी सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बन सकते।

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