🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

सेवानिवृत्ति के बाद भी स्कूल से जुड़ा ‘गुरु का रिश्ता’, बिना वेतन पढ़ा रहे अशोक चक्रवर्ती

चंद्रकोणा के प्राथमिक स्कूल में ‘चरैवेति’ को जीवन मंत्र बनाकर बच्चों को दे रहे शिक्षा और स्नेह।

पश्चिम मेदिनीपुरः आज के समय में जहां कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी की खबरें सामने आती हैं, वहीं चंद्रकोणा के एक छोटे से गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो उम्मीद जगाती है। यहां एक शिक्षक सेवानिवृत्ति के बाद भी बिना किसी वेतन के रोज स्कूल आकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

यह कहानी है अशोक कुमार चक्रवर्ती की, जिनके जीवन में ‘अवकाश’ शब्द मानो है ही नहीं। वर्ष 2023 में नौकरी से रिटायर होने के बावजूद वे आज भी हर दिन की तरह स्कूल पहुंचते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं और छुट्टी के बाद उनके साथ ही घर लौटते हैं।

चंद्रकोणा-1 ब्लॉक के लक्ष्मीपुर गांव के रहने वाले अशोक कहते हैं, “यह मेरे जीवन की आदत बन चुकी है। घर पर बैठना मेरे बस की बात नहीं। इतने वर्षों तक वेतन मिला, अब पेंशन मिल रही है, वही काफी है। बच्चों को पढ़ाना ही मुझे खुशी देता है।”

स्कूल से शुरू हुआ रिश्ता, आज भी कायम

लक्ष्मीपुर दक्षिणबाड़ प्राथमिक विद्यालय की शुरुआत साल 2003 में कुछ गिने-चुने बच्चों के साथ एक क्लब से हुई थी। बाद में सरकारी मान्यता मिलने के बाद गांव के एक व्यक्ति द्वारा दान की गई जमीन पर स्कूल की इमारत बनी।अशोक चक्रवर्ती उसी समय इस स्कूल से जुड़े और लंबे समय तक प्रभारी शिक्षक के रूप में इसकी जिम्मेदारी संभाली। आज भी वे पहले की तरह सबसे पहले स्कूल पहुंचते हैं और दिनचर्या की शुरुआत करते हैं।

शिक्षकों की कमी के बीच सहारा बने ‘अशोक सर’

स्कूल में इस समय करीब 105 छात्र हैं, जबकि शिक्षक मात्र दो और एक पार्श्व शिक्षक हैं। ऐसे में अशोक चक्रवर्ती का रोज आना बच्चों और स्कूल दोनों के लिए बड़ी राहत है। स्कूल के शिक्षक बताते हैं कि अशोक सर का छात्रों से गहरा लगाव है। वे न सिर्फ पढ़ाई में मदद करते हैं, बल्कि किसी छात्र के बीमार होने पर उसके घर भी पहुंच जाते हैं। स्कूल के प्रभारी शिक्षक प्रदीप मइती कहते हैं, “हमने उन्हें बहुत करीब से देखा है। स्कूल के प्रति उनका समर्पण अद्भुत है। बच्चों से उनका रिश्ता परिवार जैसा है। जिस दिन वे नहीं आते, बच्चे खुद उनका हाल पूछते हैं।”

छात्रों और अभिभावकों के लिए प्रेरणा

पांचवीं कक्षा की छात्रा नेहा चौधरी और छात्र कमल घोष बताते हैं कि “अशोक सर हमें बहुत प्यार से पढ़ाते हैं। अगर हम पढ़ाई में कमजोर भी हों, तो वे नाराज नहीं होते, बल्कि हमें समझाते हैं।”

अभिभावक कार्तिक चौधरी का कहना है, “स्कूल की शुरुआत से ही अशोक सर जुड़े हैं। उन्होंने अपने हाथों से इस स्कूल को खड़ा किया है। पढ़ाना उनके लिए नौकरी नहीं, जुनून है।”

अशोक चक्रवर्ती कहते हैं, “यह स्कूल मेरे लिए परिवार जैसा है। छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर घर बैठना संभव नहीं। जब तक संभव होगा, मैं आता रहूंगा। बच्चों का भविष्य बनता देखना ही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।”

अपने परिवार के बारे में बताते हुए वे कहते हैं कि उनका एक बेटा और एक बेटी है, दोनों उच्च शिक्षित हैं। बेटी की शादी हो चुकी है और बेटा डॉक्टर है। वे कहते हैं कि उनकी पत्नी भी इस काम में पूरा समर्थन करती हैं। यह कहानी सिर्फ एक शिक्षक की नहीं, बल्कि उस समर्पण की है जो शिक्षा को नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम मानता है।

Articles you may like: