नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता द्वारा न्यायिक अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराने की अनुमति मांगने पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में कार्यरत किसी जज के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए सीधे याचिका दाखिल करना उचित प्रक्रिया नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया के पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के तय नियमों के अनुसार, किसी मौजूदा जज के खिलाफ FIR दर्ज करने से पहले संबंधित मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक स्तर पर अनुमति लेना अनिवार्य होता है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि शिकायत दर्ज करना और FIR की अनुमति मांगना दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। यदि किसी मामले में शिकायत पहले से लंबित है, तब भी FIR के लिए अलग से मंजूरी आवश्यक होगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि याचिकाकर्ता ने कार्यवाही का वीडियो यूट्यूब पर साझा किया। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि कोर्ट की कार्यवाही को सोशल मीडिया पर प्रसारित करना नियमों के खिलाफ है।
राज्य सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील संजीव भंडारी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इसमें महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित आदेश को पहले ही चुनौती दी जा चुकी है और वीडियो साझा करना नियमों का उल्लंघन है।
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील को सलाह दी कि वे उचित प्रक्रिया का पालन करें और निष्पक्ष तरीके से दलील रखें। साथ ही, संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह तय की गई है।