मिदनापुर : मिदनापुर स्थित विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन हो गया। दूसरे दिन विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने अपने विचार रखे और विषय के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा की।
तृतीय आलोचना सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रवि भूषण ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल संस्कृत तक सीमित करने की कोशिश में कबीर सबसे बड़ी चुनौती हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में ज्ञान परंपरा पर चर्चा चौंकाने वाली लगती है।
हावड़ा हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि लोक भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहले लोक भाषा आती है फिर शास्त्र और साहित्य की भाषा विकसित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब ज्ञान परंपरा रूढ़ हो जाती है तो वह अंधविश्वास का रूप ले लेती है।
डॉ. सुभाष चंद्र गुप्ता ने कहा कि भारत में ज्ञान की कई परंपराएं एक साथ विकसित हुई हैं। वहीं सागर विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश के डॉ. संजय नाइनवाड ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल वैदिक साहित्य तक सीमित नहीं है। अन्य साहित्य और अनुवाद भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
शोध पत्र वाचन सत्र की अध्यक्षता डॉ. पंकज साहा ने की। इस सत्र में डॉ. रेणु गुप्ता, डॉ. सोनम सिंह, उष्मिता गौड़, मदन शाह, तेजेश्वर नोनिया, रिया श्रीवास्तव और नेहा शर्मा ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के दौरान अनुराधा कुमारी, मौली मुखर्जी, रूथ कर, अंजलि शर्मा, निसार अहमद, उषा दुबे, रंभा कुमारी और काजल ठाकुर ने कविता कोलाज प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी का संचालन सुषमा कुमारी और रुपेश कुमार यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. श्रीकांत द्विवेदी और रिया श्रीवास्तव ने दिया।
इस अवसर पर लेखक और समीक्षक मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. संजय पासवान, डॉ. प्रकाश अग्रवाल, चंदना मंडल सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में नसरीन बानो, अर्जुन शर्की, विवेक भोला, पिंकी बहादुर, अदिति शर्मा, इंदु शर्मा, प्रिया मिश्रा और अनिल साह का विशेष सहयोग रहा।