मेदिनीपुर: हिंदी विभाग, विद्यासागर विश्वविद्यालय द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का प्रथम दिवस बौद्धिक ऊर्जा और गंभीर विमर्श के साथ संपन्न हुआ। स्वागत भाषण में विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद कुमार प्रसाद ने भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल पुस्तकीय सीमाओं से परे बताते हुए इसे ज्ञान, विज्ञान, कला और संस्कृति के व्यापक समन्वय का जीवंत रूप कहा। उन्होंने इसे हमारी पहचान और आत्मा का प्रतिबिंब बताया।
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कुलपति प्रो. दीपक कुमार कर ने कहा कि हिंदी साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का एक सशक्त माध्यम है। वेदों और उपनिषदों से लेकर आधुनिक साहित्य, संस्कृति और आध्यात्म तक इसकी व्यापकता इसे विशिष्ट बनाती है। उन्होंने रेखांकित किया कि इस पूरी प्रक्रिया में भाषा, विशेषकर 'हिंदी' एक महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभाती है। कला एवं वाणिज्य संकायाध्यक्ष प्रो. अरिंदम गुप्ता ने साहित्य को किसी भी भाषा की रीढ़ बताते हुए कहा कि हिंदी साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा को निरंतर जीवंत बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
बीज वक्तव्य में वरिष्ठ आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज देशभर के विश्वविद्यालयों में विमर्श का केंद्र बन चुकी है, जो अवसर के साथ-साथ एक चुनौती भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह परंपरा किसी एक रूप में सीमित नहीं बल्कि अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं का समृद्ध संगम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद जैसे मनीषियों पर पुनर्विचार आवश्यक है, जो वर्तमान विमर्श से हाशिए पर चले गए हैं।
सत्र संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने आगाह किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते समय पश्चिमी श्रेष्ठताबोध से बचना होगा। विविध विचारों का समन्वय ही इसकी वास्तविक शक्ति है।
प्रथम आलोचना सत्र में विश्वभारती विश्वविद्यालय के प्रो. मुक्तेश्वरनाथ तिवारी ने हिंदी साहित्य में निहित ज्ञान परंपरा की गहराई को रेखांकित किया और रामविलास शर्मा के योगदान को विशेष रूप से स्मरण किया। वरिष्ठ आलोचक प्रो. रवि भूषण ने समकालीन समाज की विसंगतियों पर चिंता जताते हुए कहा कि एक ओर भय, हिंसा और असत्य का प्रसार है, वहीं दूसरी ओर ज्ञान परंपरा पर विमर्श—यह गहरा विरोधाभास है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को लिखित और मौखिक दोनों रूपों में समृद्ध बताते हुए इसे किसी एक ढांचे में सीमित करने के प्रयासों पर सवाल उठाए।
द्वितीय सत्र में प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि ज्ञान गतिशील है इसलिए उसकी परंपरा भी परिवर्तनशील होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा लोक और शास्त्रीय धाराओं के संगम से निर्मित एक जीवंत प्रक्रिया है। डॉ. संजय राय ने परंपरा में प्रतिरोध के स्वर को रेखांकित करते हुए संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. राहुल शर्मा ने कथाओं को इस परंपरा की आधारशिला बताया, जबकि डॉ. आदित्य गिरि ने उपन्यास की भूमिका पर प्रकाश डाला। डॉ. शारदा बनर्जी ने ज्ञान परंपरा और मानवतावाद के संबंध को स्पष्ट किया। शोधार्थी रचना रश्मि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।
इस अवसर पर शोध सारांशिका का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन उष्मिता गौड़ा एवं मदन शाह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सुषमा कुमारी और सोनम सिंह ने प्रस्तुत किया। यह संगोष्ठी न केवल भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई को उजागर करती है बल्कि समकालीन संदर्भों में उसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।