नई दिल्लीः दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को कश्मीरी अलगाववादी और ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ की प्रमुख एशिया अंद्राबी को देश के खिलाफ साजिश रचने के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह ने अंद्राबी की दो सहयोगियों सोफी फहमीदा और नाहिदा नसीरीन को भी इस मामले में 30-30 वर्ष के कारावास की सजा दी।
तीनों को 14 जनवरी को दोषी ठहराया गया था। इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अदालत से अंद्राबी के लिए उम्रकैद की मांग करते हुए कहा था कि उन्होंने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ा और राज्य के खिलाफ साजिश रचने पर कड़ी सजा का संदेश देना जरूरी है।
अपने 286 पृष्ठों के आदेश में अदालत ने कहा कि अंद्राबी और उनके सहयोगियों ने कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रची थी।
अदालत ने कहा कि एनआईए द्वारा प्रस्तुत वीडियो में स्पष्ट रूप से दिखता है कि वे बार-बार दावा करती थीं कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है और भारत के कब्जे में है।
आदेश में कहा गया कि कश्मीर को भारतीय कब्जे से मुक्त कर पाकिस्तान का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। रिकॉर्ड में ऐसे कई भाषण और पोस्ट मौजूद हैं, विशेष रूप से अंद्राबी के। अदालत ने कहा कि अंद्राबी ने अपने भाषणों और साक्षात्कारों में पाकिस्तान का समर्थन लेने की खुलकर वकालत की और यह प्रचारित किया कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था।
अदालत ने यह भी कहा, “यह स्पष्ट है कि आरोपी केवल यह नहीं कह रहे कि कश्मीर विभाजन का अधूरा एजेंडा है, बल्कि वे इस मुद्दे का दुरुपयोग कर यह प्रचारित कर रहे हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है।”
अदालत ने यह भी पाया कि अंद्राबी द्वारा स्थापित संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ भारत के एक अभिन्न हिस्से को अलग करने की गतिविधियों में “आत्मनिर्णय के अधिकार” के बहाने शामिल था।
इन गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए कई भाषण दिए गए और साक्षात्कार किए गए। विभिन्न पोस्टों में अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा इस उद्देश्य को बढ़ावा देने और समर्थन करने के लिए बैठकों/आयोजन का उल्लेख है। अदालत के अनुसार अभियुक्तों ने यह दिखाने की कोशिश की कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है और भारत का वहां अवैध कब्जा है।
अदालत ने यह भी कहा कि अभियुक्तों ने भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन को धार्मिक आधार पर ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ पर आधारित बताने वाले नैरेटिव को बढ़ावा दिया। अंद्राबी और उनकी दोनों सहयोगियों पर फरवरी 2021 में यूएपीए और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए थे।