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Bengal Election: हावड़ा की फैक्ट्री बेल्ट में खामोशी, चुनावी शोर बढ़ा, नहीं बदली मजदूरों की तकदीर

कभी औद्योगिक पहचान के लिए मशहूर शहर आज घटते उद्योगों और अस्थिर आजीविका से जूझ रहा है, मजदूरों की मांग-स्थायी रोजगार और सुरक्षित भविष्य।

By श्वेता सिंह

Mar 24, 2026 18:55 IST

हावड़ा: एक समय था जब हावड़ा की पहचान धुआं उगलती चिमनियों, मशीनों की लगातार गूंज और हजारों कामगारों की रोजी-रोटी से जुड़ी थी। शहर की औद्योगिक गतिविधियां न सिर्फ स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं, बल्कि पूर्वी भारत के विकास की भी एक मजबूत कड़ी मानी जाती थीं। लेकिन आज वही हावड़ा खामोश फैक्ट्रियों, जंग लगे गेटों और काम की तलाश में भटकते मजदूरों की कहानी बन चुका है।

2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह बदलाव केवल आर्थिक या सामाजिक चिंता का विषय नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर सामने आया है। शहर के विभिन्न हिस्सों में उद्योगों के बंद होने और रोजगार के अवसरों के सिमटने ने चुनावी बहस को नई दिशा दे दी है।

फैक्ट्री बेल्ट में पसरा सन्नाटा

धर्मतला रोड, घुसुड़ी, काली मजूमदार रोड, दासनगर और सालकिया जैसे इलाके, जो कभी छोटे-बड़े उद्योगों के लिए जाने जाते थे, अब अपनी पुरानी पहचान खोते नजर आते हैं। 1990 के दशक में जहां हावड़ा में 400 से अधिक फाउंड्री यूनिट सक्रिय थीं, वहीं अब उनकी संख्या घटकर करीब 70 रह गई है। बार्न स्टैंडर्ड, तारा, शंकर और राजस्थान रोलिंग मिल जैसे कई प्रमुख प्रतिष्ठान बंद हो चुके हैं। जूट मिलों के बंद होने से हजारों परिवारों की आय पर सीधा असर पड़ा है, जिससे पूरे क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है।

मजदूरों की टूटी जिंदगी और बढ़ती मजबूरी

इन उद्योगों के बंद होने का सबसे ज्यादा असर उन मजदूरों पर पड़ा है, जो कभी इन फैक्ट्रियों की रीढ़ हुआ करते थे। रॉबिन चट्टोपाध्याय, विधान चक्रवर्ती और सुफन हल्दार जैसे कई श्रमिक अब छोटे-मोटे काम कर किसी तरह अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। कई परिवार ऐसे हैं, जहां रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बन चुका है। उनके लिए विकास के बड़े दावे या राजनीतिक बयानबाजी का कोई खास मतलब नहीं है। उनकी प्राथमिकता सिर्फ एक है-स्थायी रोजगार और नियमित आय।

हर इलाके में दिखता असर

स्थिति केवल कुछ इलाकों तक सीमित नहीं है। उत्तर, मध्य हावड़ा और शिवपुर-तीनों क्षेत्रों में उद्योगों के बंद होने का असर साफ दिखाई देता है। इंडियन मशीनरी, रेमिंगटन रैंड, फ्लावर मिल और कई जूट मिलों के बंद होने से रोजगार के अवसर लगातार घटते गए हैं। स्थानीय लोगों और मजदूरों का मानना है कि बिजली की बढ़ती लागत, कच्चे माल की महंगाई, पुरानी तकनीक और विभिन्न तरह के दबावों ने उद्योगों को कमजोर कर दिया है।

आंकड़ों से अलग जमीनी हकीकत

आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। कभी देश के औद्योगिक नक्शे पर मजबूत स्थिति रखने वाला पश्चिम बंगाल अब काफी पीछे खिसक चुका है। 1960-61 में जहां राज्य प्रति व्यक्ति आय के मामले में राष्ट्रीय औसत से आगे था, वहीं अब यह उससे काफी नीचे आ चुका है। हालांकि हालिया आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी दर 3.6 प्रतिशत बताई जाती है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन हावड़ा जैसे पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों की जमीनी सच्चाई इससे अलग है। यहां रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

समाधान की राह और चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति को सुधारने के लिए छोटे और मध्यम उद्योगों को नई तकनीक, बेहतर बुनियादी ढांचे और कौशल विकास के साथ फिर से खड़ा करना होगा। सरकार ने ‘बांग्लार युवा साथी’ योजना के तहत युवाओं को मासिक आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है, लेकिन श्रमिकों का कहना है कि ऐसी योजनाएं अस्थायी राहत जरूर देती हैं, पर स्थायी समाधान नहीं हैं। उनके लिए सबसे जरूरी है नियमित और सुरक्षित रोजगार।

चुनावी सियासत में गरम मुद्दा

इसी पृष्ठभूमि में चुनावी राजनीति भी तेज हो गई है। लोहा और इंजीनियरिंग इंडस्ट्री के लिए मशहूर यह इलाका अब असल में इंडस्ट्रियल बर्बादी की निशानी बन गया है। ऐसे में पॉलिटिकल दबाव भी बढ़ रहा है। उत्तर हावड़ा से BJP उम्मीदवार उमेश राय पहले ही इस मुद्दे पर बोल चुके हैं। उन्होंने कहा, 'हम बंद फैक्ट्रियों के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे।' उन्होंने दावा किया, 'उत्तर हावड़ा कभी छोटे और मीडियम उद्योगों के केंद्रों में से एक था। धर्मतला रोड, घुसुरी, काली मजूमदार रोड सहित एक बड़े इलाके में कई औद्योगिक यूनिट्स स्थापित की गई थीं। यह इलाका लोहे और इंजीनियरिंग उद्योगों, विभिन्न रोलिंग मिलों, बर्फ मिलों, इन सभी से बहुत व्यस्त था। लेकिन अब वह तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है।'

काम की तलाश में एक ही सवाल

भाजपा ने बंद उद्योगों के मुद्दे को प्रमुख चुनावी एजेंडा बनाया है और वादा किया है कि सत्ता में आने पर वे बंद कारखानों को फिर से चालू करेंगे तथा नए उद्योग स्थापित करेंगे।

दूसरी ओर, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने इस आरोप से इनकार किया है। जिला मंत्री अरूप राय का दावा है कि राज्य में इंडस्ट्री बढ़ी है और नए इन्वेस्टमेंट आए हैं। उनके मुताबिक, 'इंडस्ट्री का नेचर बदल रहा है। पुरानी इंडस्ट्री की जगह नई तरह की इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर उभर रहे हैं, जो भविष्य के लिए ज्यादा सही हैं।'

हालांकि इन दावों और वादों के बीच जमीनी स्तर पर मजदूरों के लिए सवाल अब भी वही है-काम कब मिलेगा और उनकी जिंदगी कब पटरी पर लौटेगी। हावड़ा की पुरानी औद्योगिक पहचान कब फिर से स्थापित होगी, यह आने वाले समय और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा।

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, हावड़ा में यह मुद्दा और अधिक गहराता जा रहा है। बंद फैक्ट्रियों की खामोशी और मजदूरों की पुकार अब राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी है। अब देखना यह होगा कि क्या चुनावी वादे इस शहर की खोई हुई औद्योगिक रफ्तार को वापस ला पाते हैं या हावड़ा यूं ही बेरोजगारी और अनिश्चितता के बीच संघर्ष करता रहेगा।

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