सिर्फ छात्र अथवा छात्रा के लिए नहीं बल्कि बल्कि एक ऐसा हॉस्टल जहां विद्यार्थी लड़का अथवा लड़की की पहचान से बाहर निकलकर आराम से रह सकें। इसलिए जादवपुर यूनिवर्सिटी में कुछ छात्रों ने परिसर में 'जेंडर न्यूट्रल हॉस्टल' की मांग की है। स्टूडेंट संगठन SFI ने भी इस मांग का समर्थन किया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन भी इस मांग को 'गलत' नहीं मानतीं।
छात्रों की मांग है कि परिसर में कई ऐसे छात्र/छात्राएं हैं जो खुद को महिला या पुरुष नहीं मानते। उनमें से कुछ तो शायद अभी खुद को थर्ड जेंडर भी नहीं मानते। ऐसे छात्रों को अपने जन्मगत पहचान के आधार पर महिला या पुरुष हॉस्टल में रहना पड़ता है। वहां उन्हें कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है।
SFI की तरफ से शुभदीप बनर्जी ने कहा कि साल 2023 में यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रैगिंग और यौन उत्पीड़न की वजह से जिस छात्र की मौत हुई वह भी थोड़ा नर्म स्वभाव का था। इस वजह से ही उसका यौन शोषण हुआ। सिर्फ वह घटना ही नहीं बल्कि परिसर में आम तौर पर ऐसे कई कई हैं जो ब्वॉयज या गर्ल्स हॉस्टल में रहने में असहज महसूस करते हैं। इसीलिए हमने यह मांग उठाई है।
अभी जादवपुर यूनिवर्सिटी परिसर में लड़कों के लिए करीब 5 हॉस्टल हैं और लड़कियों के लिए दो। रिसर्च स्कॉलर्स हॉस्टल में सिर्फ लड़के रहते हैं। नाम न बताने की शर्त पर एक ट्रांस स्टूडेंट ने कहा कि मेरा घर बर्दवान में है। परिवार में आर्थिक दिक्कतों की वजह से मैं कुछ समय के लिए मेन्स हॉस्टल में रहा लेकिन वहां कई लड़कों के बीच मैं खुद को ढाल नहीं पाया।
खासकर टॉयलेट में, कपड़े बदलते समय मुझे इतना अजीब लगता था कि कई बार मैं साउथ सिटी मॉल चला जाता था और वहां एक स्टोर का चेंजिंग रूम या टॉयलेट इस्तेमाल करता था। हालांकि बाद में उक्त छात्र ने अपनी एक दोस्त के साथ एक फ्लैट किराए पर लेकर रहना शुरू कर दिया।
यूनिवर्सिटी में शोध कर रही बिदु चंदर का कहना है कि ऐसे कई स्टूडेंट्स मेस में रहने या फ्लैट किराए पर लेने के लिए ज्यादा रुपए नहीं खर्च कर पाते हैं। हालांकि अगर वे हॉस्टल में रहते भी हैं तो लड़के या लड़कियों को कई तरह की मानसिक परेशानियां और दबाव झेलने पड़ते हैं। इस वजह से जेंडर-न्यूट्रल हॉस्टल एक बहुत जरूरी मांग है। हालांकि छात्र संगठन ABVP ने इस मांग की आलोचना की है। अपने एक बयान में उन्होंने लिखा है कि अब तक परिसर में नशे की मांग की जाती थी। उसी नशे में ही उन्होंने ये सारी मांगें (जेंडर-न्यूट्रल हॉस्टल) की हैं। लेकिन परिसर के आम छात्र-छात्राएं इसे बस पागलपन ही मान रहे हैं।
जादवपुर यूनिवर्सिटी की विमेंस स्टडीज की प्रोफेसर ऐशिका चक्रवर्ती भी छात्रों के इस मांग का समर्थन करती हैं। उनका कहना है, "ट्रांस, क्वीर और दूसरे जेंडर के छात्र-छात्राओं की सुरक्षा और सेक्सुअल सिक्योरिटी के लिए जेंडर-न्यूट्रल हॉस्टल जरूरी हैं। हालांकि उनकी संख्या कम है लेकिन उन्हें परिसर और हॉस्टल में सुरक्षित रखने के लिए एक सुरक्षित माहौल और पूरी जागरूकता की जरूरत है।" इसके साथ ही छात्रों ने उत्पीड़न को रोकने के लिए एक ऐप और उत्पीड़न का शिकायत मिलने के तुरंत बाद कार्रवाई करने की मांग की है। इस ऐप के जरिए आपातकालीन परिस्थिति में आपदा सिग्नल भेजा जा सके और शिकायत दर्ज करवायी जा सके।
जादवपुर यूनिवर्सिटी के उपाचार्य चिरंजीव भट्टाचार्य इन मांगों को पूरी तरह से नकारा नहीं है। ऐप की मांग से वह पूरी तरह सहमत हैं। हॉस्टल के बारे में उपाचार्य ने कहा कि जगह की वजह कमी होने की वजह से अभी जेंडर-न्यूट्रल हॉस्टल बनाना मुमकिन नहीं है। लेकिन छात्रों से बातचीत के बाद हॉस्टल के किसी खास एरिया या फ्लोर को जेंडर-न्यूट्रल बनाया जा सकता है।
छात्र आज (सोमवार) को इस मुद्दे पर यूनिवर्सिटी अधिकारियों से बात करेंगे।