नई दिल्ली : सरकारी बीमा कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य बीमा एजेंटों के कमीशन में कटौती के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के इस कदम से एजेंटों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि इस फैसले का सीधा असर 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के स्वास्थ्य बीमा पर पड़ सकता है।
जानकारी के अनुसार पहले 60 साल से ऊपर के लोगों का स्वास्थ्य बीमा कराने पर एजेंटों को 10% कमीशन मिलता था जिसे 1 अप्रैल से घटाकर 7.5% कर दिया गया है। एजेंट संगठनों का आरोप है कि बिना किसी पूर्व चर्चा के यह फैसला लिया गया जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा। इसी के विरोध में सोमवार को कोलकाता स्थित क्षेत्रीय कार्यालय में एजेंटों ने डिप्टी जनरल मैनेजर को ज्ञापन सौंपा।
एजेंटों का कहना है कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को स्वास्थ्य बीमा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है क्योंकि अधिकांश लोग रिटायरमेंट के बाद कंपनी के बीमा कवर से बाहर हो जाते हैं। ऐसे में व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा ही उनका सहारा होता है लेकिन कमीशन घटने से एजेंटों की इस वर्ग के ग्राहकों में रुचि कम हो सकती है जिससे बुजुर्गों का बीमा कवरेज प्रभावित होने का खतरा है।
एजेंटों में नाराजगी का एक और कारण यह भी है कि हाल ही में बीमा कंपनियों के स्थायी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की गई है जबकि एजेंटों की आय का एकमात्र स्रोत कमीशन ही है। उनके पास न तो स्थायी वेतन होता है और न ही पीएफ या ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं।
एजेंटों ने यह भी आरोप लगाया कि बीमा पॉलिसी पोर्ट कराने पर उन्हें कोई कमीशन नहीं दिया जाता जिससे उनकी आय और घटती है। इसके अलावा क्लेम के समय निजी अस्पतालों द्वारा बढ़े हुए बिल और बीमा कंपनियों द्वारा आंशिक भुगतान से ग्राहकों को परेशानी होती है जिसका दबाव एजेंटों पर आता है।
एजेंट संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो 10 अप्रैल को विरोध प्रदर्शन किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर सामूहिक इस्तीफा भी दिया जा सकता है।