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एशिया में ‘डर्टी फ्यूल’ की मांग बढ़ी, होरमुज संकट से ईंधन आपूर्ति पर दबाव

बढ़ते प्रदूषण के कारण जिन देशों ने कोयले जैसे “डर्टी फ्यूल” से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, वे अब ऊर्जा संकट के चलते फिर उसी ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं।

By राखी मल्लिक

Apr 05, 2026 11:00 IST

नई दिल्ली : इतिहास से संकेत मिलता है कि कोयले का उपयोग मानव सभ्यता में बहुत पहले शुरू हो गया था। कुछ शोध बताते हैं कि लगभग 1650 ईसा पूर्व के आसपास उत्तर-पश्चिम चीन के शिनजियांग क्षेत्र में घरेलू उपयोग के लिए बिटुमिनस कोयले का इस्तेमाल होता था, जबकि अन्य स्रोतों के अनुसार नवपाषाण काल में ही करीब 4000 ईसा पूर्व चीन के कुछ हिस्सों में लोग कोयले से परिचित हो चुके थे।

वर्तमान परिदृश्य में स्थिति एक अलग दिशा लेती दिख रही है। बढ़ते प्रदूषण के कारण जिन देशों ने कोयले जैसे “डर्टी फ्यूल” से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, वे अब ऊर्जा संकट के चलते फिर उसी ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और खासकर होरमुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के कारण एशिया के कई देश ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं।

इस स्थिति के लिए केवल भारत को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। बड़ी आबादी के कारण भारत की ऊर्जा मांग स्वाभाविक रूप से अधिक है, लेकिन मौजूदा संकट का असर पूरे एशिया पर पड़ा है। भारत के अलावा बांग्लादेश, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस जैसे देशों ने भी कोयले की ओर रुख किया है। दक्षिण कोरिया ने जहां कोयला आधारित संयंत्रों को बंद करने की समयसीमा टाल दी है, वहीं फिलीपींस ने ऊर्जा आपातकाल घोषित कर उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

इसका मूल कारण साफ है—महंगे आयातित तेल और गैस पर निर्भरता कम करना। ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए देश फिर से कोयला आधारित उत्पादन को बढ़ावा दे रहे हैं। बांग्लादेश और थाईलैंड जैसे देश भी अपने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने पर जोर दे रहे हैं।

समस्या केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। होरमुज क्षेत्र में तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। एलएनजी, जिसे अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, अब कम उपलब्ध हो रहा है। जिससे ऊर्जा बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सप्ताह पहले तक जहां वैश्विक ऊर्जा स्थिति संतुलित थी, अब वह गंभीर कमी की ओर बढ़ गई है। इसका असर कीमतों पर भी दिख रहा है और एलएनजी की दरें लगातार बढ़ रही हैं। यदि मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहे, तो वैश्विक स्तर पर बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है।

कई देशों ने हालात से निपटने के लिए ऊर्जा बचत के उपाय शुरू कर दिए हैं। श्रीलंका ने सरकारी दफ्तरों में चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करने की घोषणा की है, जबकि वियतनाम ने वर्क-फ्रॉम-होम को बढ़ावा दिया है। पाकिस्तान ने भी ऊर्जा बचत के लिए स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि एलएनजी आपूर्ति प्रणाली को सामान्य होने में काफी समय लग सकता है, भले ही मौजूदा तनाव खत्म हो जाए। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि एक ओर गैस की कमी है, वहीं दूसरी ओर महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा।

देश के सभी आयात (इम्पोर्ट) टर्मिनलों की क्षमता का उपयोग पिछले दो महीनों में घटकर तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। यानी जो इंफ्रास्ट्रक्चर ईंधन (जैसे एलएनजी आदि) को संभालने और इस्तेमाल करने के लिए बना है, उसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।

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