अमरावती : पति कोमा में हैं। उनके बैंक खाते में धनराशि होने के बावजूद इलाज के लिए पत्नी के हाथ में पैसे नहीं थे। ऐसी स्थिति में आंध्र प्रदेश की निवासी नागम्मा ने पति के “अभिभावक” के रूप में मान्यता देने और उनके बैंक खाते से धन निकालने की अनुमति मांगते हुए आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति वेंकटेश्वरलु निम्मागड्डा ने 6 अप्रैल को उनकी याचिका स्वीकार कर ली।
मामला क्या था? ‘लाइव लॉ’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में नागम्मा के 65 वर्षीय पति को मस्तिष्क में रक्तस्राव होने के बाद कोमा में जाना पड़ा। सर्जरी के बावजूद उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ और वे वेजिटेटिव स्टेट में चले गए। उनकी सांसें ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब की मदद से चल रही थीं। वहीं भोजन और पोषण के लिए राइल्स ट्यूब का उपयोग करना पड़ रहा था।
उस समय नागम्मा के पति के बैंक खाते में 14.38 लाख रुपये जमा थे लेकिन नागम्मा के पास इलाज का खर्च उठाने के लिए कोई धन नहीं था। ऐसी परिस्थिति में उन्होंने अदालत से स्वयं को पति का अभिभावक नियुक्त किए जाने की मांग की।
अदालत में नागम्मा ने कहा कि उन्हें पति के इलाज और अपने दो बच्चों के पालन-पोषण के लिए पैसों की आवश्यकता है। इसी कारण उन्होंने पति के बैंक खाते के उपयोग की अनुमति मांगी।
न्यायमूर्ति वेंकटेश्वरलु निम्मागड्डा ने अपने फैसले में कहा कि जब कोई व्यक्ति वेजिटेटिव स्टेट में होता है, तब वह स्वयं निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। ऐसे मामलों में भारत की प्राचीन अवधारणा “अर्धांगिनी” — अर्थात पत्नी को पति का आधा अंग माना जाता है — के आधार पर पत्नी को नैतिक और कानूनी रूप से पति के बैंक खाते का उपयोग करने का अधिकार दिया जा सकता है।