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उतार-चढ़ाव से भरा रहा मुकुल राय का राजनैतिक जीवन : कांग्रेस से अलग होकर UPA सरकार में ही बनें रेल मंत्री

मुकुल राय एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं, जिनके तेज तर्रार दिमाग का हर पार्टी कायल रहा है।

By Moumita Bhattacharya

Feb 23, 2026 17:38 IST

कोलकाता के एक निजी अस्पताल में लंबी बीमारियों से लड़ते हुए पश्चिम बंगाल की राजनीति के 'चाणक्य' मुकुल राय (Mukul Roy) ने अपनी आखिरी सांसे ली। वह 71 वर्ष के थे। सोमवार की सुबह जैसे ही यह खबर फैली हर तरफ शोक का माहौल छा गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जहां उन्हें अपना पुराना 'सहकर्मी' करार दिया वहीं तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने उन्हें तृणमूल का 'फाउंडिंग पिलर' कहा।

अपने शोक वार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मुकुल राय को हमेशा याद रखा जाएगा। मुकुल राय एक ऐसे व्यक्ति रहे हैं, जिनके तेज तर्रार दिमाग का हर पार्टी कायल रहा है।

तृणमूल कांग्रेस के गठन के शुरुआती दिनों से ही मुकुल राय इस पार्टी से जुड़े रहे हैं। बाद में हवा ने अपना रुख बदला और उन्होंने पार्टी बदलकर भाजपा का दामन थाम लिया था। बाद में मुकुल राय की तृणमूल में घर वापसी जरूर हुई लेकिन स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं की वजह से धीरे-धीरे वह राजनीति से दूर होते चले गए।

तृणमूल को सत्ता में लाने में निभायी प्रमुख भूमिका

ममता बनर्जी जिस समय एक युवा नेता के तौर पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में उभर रही थी, मुकुल राय उसी समय से उनके साथ खड़े रहे हैं। 1998 में मुकुल राय ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में कुछ अन्य नेताओं के साथ कांग्रेस छोड़कर बाहर निकल आए और तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। तृणमूल की लोकप्रियता जिस तरह तेजी से बढ़ी, मुकुल राय भी उसी तेजी के साथ बंगाल की राजनीति में चमक उठे। साल 2006 में वह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए।

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अगर यह कहा जाए कि तृणमूल की नींव को मजबूत बनाने में मुकुल राय का प्रमुख योगदान रहा है, तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। यह मुकुल राय का ही कमाल रहा है कि तृणमूल ने पिछले 34 सालों से बंगाल पर शासन कर रहे वामपंथी सरकार की जड़ों को उखाड़ फेंका और 2011 के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की।

राय को पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'चाणक्य' तक कहा जाता था।

राष्ट्रीय राजनीति में भी रहे सक्रिय

मुकुल राय सिर्फ बंगाल की क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। वर्ष 2006 में राज्य सभा चुनाव में चयनित होने के बाद मुकुल राय का नई दिल्ली में काफी ज्यादा बढ़ गया। UPA सरकार के दूसरे कार्यकाल में वह बतौर जहाजरानी राज्य मंत्री मंत्रिमंडल में शामिल हुए। मार्च 2012 में उन्होंने केंद्रीय रेल मंत्री का दायित्व संभाला। खास बात यह रही कि किसी जमाने में वह तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ जिस पार्टी को छोड़कर निकल गए थे, उसी पार्टी के साथ गठबंधन में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली थी।

तृणमूल से किया भाजपा का रूख

तृणमूल कांग्रेस के साथ मुकुल राय के रिश्ते उस समय बिगड़ने लगे जब सारदा मामले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन में उन पर आरोप लगे। वर्ष 2015 में उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटा दिया गया और 2017 में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। नवंबर 2017 में उन्होंने अपना रूख बदला और भाजपा में शामिल हो गए।

उन्हें बाद में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया और बंगाल में भाजपा को अपने पैर पसारने में उन्होंने काफी मदद की। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से भाजपा ने 18 सीटें जीती थी। उसी तरह से विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने भाजपा के टिकट से कृष्णनगर में चुनाव जीता और इसका फायदा पार्टी को भी पहुंचा।

वर्ष 2021 का चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही वह तृणमूल में वापस लौट आए।

2025 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने भाजपा नेता मुकुल राय को एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत पश्चिम बंगाल विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया था। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने यह मामला कोर्ट में उठाया था। फैसले के बारे में उन्होंने कहा था कि यह भारतीय संविधान की जीत है।

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