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153 सालों की धरोहरः क्या कोलकाता की ट्राम इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी..!

37 मार्गों से सिमटकर दो लाइनों तक पहुंची एशिया की सबसे पुरानी ट्राम सेवा।

By श्वेता सिंह

Feb 24, 2026 00:29 IST

कोलकाताः कोलकाता की सड़कों पर जब ट्राम की घंटी बजती है तो वह सिर्फ एक वाहन के गुजरने की सूचना नहीं होती-वह शहर के 153 साल पुराने इतिहास की आहट होती है। लेकिन यह आहट अब धीमी पड़ती जा रही है। एशिया की सबसे पुरानी चालू ट्राम सेवा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

कोलकाता की पहचान रही ट्राम सेवा अपने 153 वर्ष पूरे कर रही है। इस अवसर पर 24 फरवरी को ट्राम प्रेमियों का समूह ‘गीतांजलि’ नामक द्वितीय विश्व युद्ध कालीन विरासत ट्राम को सड़कों पर उतारने जा रहा है। यह विशेष यात्रा कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित की जा रही है।

यह आयोजन सिर्फ एक सालगिरह नहीं, बल्कि उस सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के अस्तित्व का प्रतीकात्मक प्रतिरोध भी है, जो एशिया की सबसे पुरानी चालू ट्राम सेवा होने के बावजूद धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही है।

इतिहास की पटरियों पर: घोड़े से बिजली तक

कोलकाता में ट्राम सेवा की शुरुआत 1873 में घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली ट्राम से हुई थी। 1882 में यह भाप से संचालित होने लगी और 1902 में शहर ने अपनी पहली इलेक्ट्रिक ट्राम का स्वागत किया, जो एस्प्लेनेड से खिदिरपुर तक चली।

1960 के दशक में शहर में 37 ट्राम लाइनें सक्रिय थीं। उस समय 340 से अधिक ट्रामें सड़कों पर चलती थीं। ट्रामें उस दौर में मध्यमवर्गीय कोलकाता की जीवनरेखा थीं-सस्ती, भरोसेमंद और पर्यावरण के अनुकूल।

आज तस्वीर बदल चुकी है। अब केवल दो मार्ग-गरियाहाट से एस्प्लेनेड और एस्प्लेनेड से श्यामबाजार पर सेवा बची है। पश्चिम बंगाल ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के मुताबिक महज 7 से 10 ट्राम ही परिचालन में हैं। यह गिरावट केवल परिवहन व्यवस्था की कहानी नहीं, बल्कि बदलते शहरी दृष्टिकोण की भी दास्तान है।

‘गीतांजलि’: युद्धकाल की गवाही देती ट्राम

‘गीतांजलि’ ट्राम का इतिहास विशेष है। इसका निर्माण 1939-1945 के द्वितीय विश्व युद्ध काल में हुआ था। जापानी बमबारी के खतरे के कारण शहर में ब्लैकआउट था और नोनापुकुर वर्कशॉप में इसे मोमबत्ती की रोशनी में तैयार किया गया। यह ट्राम टॉलीगंज जैसे मार्गों के लिए डिजाइन की गई थी, जहां पटरियां हरियाली से ढके शांत इलाकों से गुजरती थीं।

1980 के दशक में यात्री सेवा से हटाए जाने के बाद इसे स्टाफ कार के रूप में इस्तेमाल किया गया। कुल दो ऐसी स्टाफ कारें थीं-एक को संरक्षित रखा गया और दूसरी अब 153वीं वर्षगांठ पर विशेष रूप से चलाई जा रही है। 2014 में इसे विरासत ट्राम घोषित किया गया। फिलहाल यह नोनापुकुर डिपो में सुरक्षित है और विशेष अवसरों पर किराए पर उपलब्ध है। ‘गीतांजलि’ केवल एक ट्राम नहीं, बल्कि युद्ध, बदलाव और शहर की स्मृतियों की साक्षी है।

क्यों सिमटती गई ट्राम सेवा?

ट्रामों की धीमी गति और ट्रैफिक जाम में योगदान को लेकर लंबे समय से आलोचना होती रही है। शहर की सड़कों में केवल लगभग 8 प्रतिशत स्थान ही यातायात के लिए उपलब्ध है। ऐसे में तेज रफ्तार वाहनों और ट्रामों के बीच संघर्ष स्वाभाविक है।

राज्य सरकार ने ट्रामों को चरणबद्ध तरीके से बंद करने की योजना बनाई है। प्रस्ताव है कि केवल एक छोटा हिस्सा-मैदान मार्ग को विरासत कॉरिडोर के रूप में संरक्षित रखा जाए। मामला फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट में विचाराधीन है। परंतु ट्राम समर्थकों का कहना है कि बुनियादी ढांचा अब भी काफी हद तक मौजूद है। यदि आधुनिक तकनीक, बेहतर शेड्यूलिंग और समर्पित लेन की व्यवस्था की जाए, तो ट्रामें फिर से प्रभावी हो सकती हैं।

ट्रामें बिजली से चलती हैं और प्रदूषण नहीं फैलातीं। ऐसे समय में जब दुनिया के कई शहर सतत और हरित परिवहन की ओर लौट रहे हैं, कोलकाता में ट्रामों का सिमटना कई सवाल खड़े करता है।

क्या समस्या ट्राम हैं या उनका प्रबंधन ?

क्या शहर ने तेज रफ्तार वाहनों को प्राथमिकता देते हुए एक टिकाऊ विकल्प को पीछे छोड़ दिया? सरकार का तर्क है कि सीमित सड़क स्थान और आधुनिक वाहनों की बढ़ती संख्या के बीच ट्रामें बाधा बनती हैं। वहीं, ट्राम प्रेमियों का कहना है कि यही समय है जब पर्यावरण-अनुकूल परिवहन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

कोलकाता ट्रामः निर्णायक मोड़ पर

कोलकाता की ट्रामें साहित्य, सिनेमा और शहर की रोजमर्रा की स्मृतियों में दर्ज हैं। वे केवल पटरियों पर चलने वाली गाड़ियां नहीं, बल्कि शहर की आत्मा का हिस्सा हैं। अगर ट्रामें पूरी तरह बंद हो जाती हैं, तो यह केवल एक परिवहन साधन का अंत नहीं होगा-यह कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान के एक अध्याय का समापन होगा।

153 साल की यह यात्रा अब एक निर्णायक मोड़ पर है। ‘गीतांजलि’ की विशेष यात्रा इस बात का प्रतीक है कि संघर्ष अभी जारी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ट्रामें रहेंगी या नहीं-सवाल यह है कि कोलकाता अपने भविष्य की योजना बनाते समय अपने अतीत को कितनी जगह देता है।

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