कोलकाता : जहां हँसी सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सोचने की वजह बन जाए, वहीं से असली व्यंग्य की शुरुआत होती है। इसी विचार को सार्थक करते हुए प्रख्यात व्यंग्यकार एवं साहित्यकार डॉ ज्ञान चतुर्वेदी ने भारतीय संस्कृति संसद के सभागार, कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई।
“शब्दों की धार, विचारों की ईमानदारी और हँसी की फुहार” से सजे इस आयोजन में डॉ ज्ञान चतुर्वेदी ने ‘व्यंग्योक्तियों के साथ उपन्यास कैसे जन्म लेता है’ विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। स्वागत भाषण तारा दुगड़ ने प्रस्तुत किया, जबकि मंच संचालन प्रियंकर पालीवाल ने किया और वक्ता की साहित्यिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
अपने संबोधन में डॉ ज्ञान चतुर्वेदी ने अपनी चर्चित कृति "नरक यात्रा" का उल्लेख करते हुए बताया कि यह उपन्यास अस्पतालों में कार्यरत महिला नर्सों के जीवन पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक के सृजन से पहले गहन अध्ययन और विस्तृत ‘होमवर्क’ आवश्यक होता है। एक रचना को आकार देने में डेढ़ से दो वर्षों की कठोर साधना लगती है और जब पुस्तक लेखक के हाथों में आती है तो वह नवजात शिशु-सी प्रतीत होती है।
व्यंग्य के माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि हम कल्पना करते हैं राम राज्य की, पर जीते हैं पादुका राज में। इसी विचारधारा ने उन्हें व्यवस्था पर आधारित उपन्यास रचने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित कुबेर नाथ राय रचनावली का लोकार्पण किया गया। 12 खंडों में प्रकाशित इस ग्रंथावली का संपादन अवधेश प्रधान और लक्ष्मण केडिया ने किया है, जिसमें कुबेरनाथ राय की समस्त प्रकाशित कृतियाँ, संस्मरण और पत्र संकलित हैं।
यह आयोजन साहित्य और व्यंग्य की गंभीर परंपरा को नई ऊर्जा देने वाला सिद्ध हुआ।