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रास्ते में ही तृणमूल के साथ जुड़े प्रतीक, ‘डील’ टिकट? कमरेड ने पार्टी बदलने का कारण बताया

‘डील’ शब्द लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस्तेमाल होता रहा है। 2016 से सीपीएम का दावा था कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर तृणमूल कांग्रेस काम कर रही है।

By देवदीप चक्रवर्ती, Posted by: प्रियंका कानू

Feb 21, 2026 22:26 IST

कोलकाता: पार्टी में ‘विद्रोह’ था। अब ‘विद्रोह’ विपक्षी पार्टी की राजनीति के मैदान में। खाली हुई सीपीएम लक्ष्य नहीं, उनका लक्ष्य बीजेपी के खिलाफ लड़ाई है। शनिवार को जोड़ा फूल का झंडा थामते हुए कमरेड प्रतीक उर ने कहा कि इस समय बीजेपी जैसी फासीवादी शक्ति के खिलाफ लड़ाई के लिए, बीजेपी को रोकने के लिए और पूरे देश में लोगों की आवाज दबाने के खिलाफ लड़ाई के लिए सबसे बड़ी शक्ति है तृणमूल कांग्रेस।

चुनाव से पहले पार्टी बदलने से कई नेताओं का प्राथमिक उद्देश्य टिकट पाना होता है। प्रतीक के पार्टी बदलने की अफवाहों के बीच कुछ सीपीएम नेताओं ने कहा कि प्रतीक तृणमूल जा रहे हैं एक ‘डील’ के तहत। इसके जवाब में प्रतीक ने कहा कि हां मेरे साथ डील हुई। बीजेपी को पश्चिम बंगाल में रोकना, यही डील थी।

‘डील’ शब्द लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति में प्रचलित है। 2016 से सीपीएम का दावा था कि केंद्र में बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर तृणमूल कांग्रेस काम कर रही है। इसके विपरीत तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि 2019 से निचले स्तर पर बाम वोट बीजेपी के वोटबॉक्स में गया। सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम के साथ जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर की ‘गुप्त’ बैठक, वेलफेयर पार्टी के साथ चर्चा और एसडीपीआई की सभा में बाम प्रतिनिधि भेजने की बात उठाते हुए प्रतीक ने कहा, ‘स्पष्ट हो गया है कि किसने कौन सी डील की।’


फेसबुक तस्वीर Eisamay.com


तृणमूल में शामिल होने के बाद अगले विधानसभा चुनाव में प्रतीक दक्षिण 24 परगना के किसी सीट से जोड़ा फूल चिन्ह पर लड़ेंगे, ऐसी खबरें मीडिया में आई हैं। कुछ विधानसभा क्षेत्रों के नाम भी सामने आए हैं। तृणमूल में शामिल होने से पहले अमितला पार्टी कार्यालय में राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ प्रतीक की लंबी बैठक हुई। वहीं उन्होंने चुनाव में टिकट मिलने का मुद्दा तय किया। अभिषेक ने कहा, ‘प्रतीक ने खुद मुझे बताया कि अगर पार्टी मुझे टिकट देती है, तो मैं टिकट नहीं लूंगा… मैं संगठन का काम करूंगा। आज के समय में कितने लोग मिलते हैं जो राजनीति में कुछ पाने-चाहने के लिए नहीं आते।’

‘प्रश्नहीन वफादारी’ सहन न कर पाने के कारण राजनीतिक मैदान में ‘दुश्मन शिविर’ में कदम रखा है, ऐसा दावा प्रतीक ने किया लेकिन ‘विद्रोही’ सूची में वह अकेले नहीं हैं, यह भी उन्होंने स्पष्ट किया। पूर्व पार्टी की ‘कॉर्पोरेट संस्कृति’ के खिलाफ वह शायद ‘व्हिसल ब्लोअर’ हैं लेकिन सूची और लंबी है, यह भी प्रतीक ने कहा। उनके मुताबिक, ‘पार्टी में दम घुटा देने वाली परिस्थितियों में कई लोगों ने मुंह खोलना शुरू कर दिया। मैं राजप्रासाद के बाहर खड़ा होकर पूछता हूं, राजा थोड़ा रुको! उस प्रासाद में सोते बच्चे जाग गए, प्रश्न करेंगे, ‘राजा तेरे कपड़े कहां हैं?’

मिट्टी से जुड़े रहने वाले प्रतीक ने क्या ‘बालसुलभ’ निर्णय लिया? या अमितला तृणमूल पार्टी ऑफिस के सामने जोड़ा फूल का झंडा हाथ में लेकर कमरेड अब नया संघर्षशील राजप्रासाद बनाएंगे, इसका जवाब राजनीति देगी। यानि, संभावना का खेल।

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