कोलकाताः पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर संगठनात्मक स्तर पर एक बार फिर बड़े बदलाव किए गए हैं। सायनी घोष को पद से हटा दिया गया है। अब कुणाल घोष को भी पार्टी में नयी जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी ने राज्य तृणमूल यूथ कांग्रेस और नॉर्थ कोलकाता संगठनात्मक जिले की नेतृत्व व्यवस्था में फेरबदल किया है, जिससे संगठन के भीतर हलचल और बढ़ गई है। इसके साथ ही पार्टी की वर्किंग कमेटी में भी कुछ नए चेहरों को शामिल किया गया है, जिनमें वरिष्ठ नेता सौगत रॉय और ज्योतिप्रिय मल्लिक के नाम प्रमुख हैं।
सूत्रों के अनुसार हाल ही में बनी नई कमेटी के बाद यह बदलाव किए गए हैं और कई ब्रांच संगठनों के नेतृत्व को लेकर सूची में फिर संशोधन हुआ है। पार्टी के अंदर यह माना जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और अंदरूनी असंतोष को देखते हुए नेतृत्व को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
सबसे बड़ा बदलाव राज्य तृणमूल यूथ कांग्रेस में देखने को मिला है, जहां पहले अध्यक्ष रहीं जादवपुर की सांसद सायनी घोष को पद से हटा दिया गया है। बताया जा रहा है कि उनका नाम उन सांसदों में शामिल रहा, जिन्होंने हाल ही में बागी माने जा रहे सांसदों के समूह से जुड़े एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने बड़ा फैसला लेते हुए संगठन की कमान बदल दी।
सायनी घोष की जगह अब अभिनेता से नेता बने अर्नब बनर्जी को राज्य तृणमूल यूथ कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। अर्नब बनर्जी को लेकर पार्टी में यह माना जा रहा है कि वे हाल के समय में लगातार टीएमसी के समर्थन में सक्रिय रहे हैं और सार्वजनिक मंचों पर भी पार्टी के पक्ष में खुलकर बयान देते रहे हैं।
इसी तरह नॉर्थ कोलकाता संगठनात्मक जिले में भी नेतृत्व परिवर्तन किया गया है। वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय की जगह अब कुणाल घोष को इस जिले की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हाल के दिनों में सुदीप बंद्योपाध्याय की कुछ राजनीतिक गतिविधियों को लेकर पार्टी के भीतर सवाल उठे थे, जिसमें उनकी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात भी चर्चा में रही।
इससे पहले भी पार्टी ने अपने महिला संगठन में बदलाव करते हुए माला रॉय को पद से हटाकर उनकी जगह अलीफा अहमद को जिम्मेदारी दी थी। लगातार हो रहे इन बदलावों से साफ है कि टीएमसी संगठन को नए सिरे से ढालने की कोशिश में लगी हुई है।
पार्टी के भीतर एक ओर जहां नेतृत्व बदलावों को संगठनात्मक मजबूती की रणनीति बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे अंदरूनी असंतोष और बदलते राजनीतिक समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लगातार हो रहे फेरबदल ने पार्टी के भीतर चर्चा और अटकलों का माहौल और तेज कर दिया है।