नई दिल्लीः फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश मामले में अभियुक्त उमर खालिद और शरजील इमाम ने एक बार फिर जमानत के लिए अदालत का रुख किया है। दोनों ने अपनी नई याचिकाओं में कहा है कि करीब छह वर्षों से जेल में रहने के बावजूद मामले में मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है, जिससे उनके मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो रहा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुमेध सैनी की अदालत में दायर इन याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा गया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 4 जुलाई के लिए निर्धारित की है। इससे पहले 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
शरजील इमाम ने अपनी याचिका में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के छह महीने बाद भी मामले की सुनवाई में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने दावा किया कि अब तक आरोप तय नहीं किए गए हैं, जबकि वह लगभग छह वर्षों से हिरासत में हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि जनवरी 2020 के दूसरे सप्ताह के बाद वह दिल्ली में मौजूद नहीं थे और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़कने से पहले ही एक अन्य मामले में हिरासत में लिए जा चुके थे।
उमर खालिद ने भी लंबी अवधि की हिरासत और मुकदमे में हो रही देरी को जमानत का आधार बनाया है। उनकी याचिका में कहा गया है कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए जाने वाले बड़ी संख्या में अभियुक्तों, गवाहों और दस्तावेजों को देखते हुए निकट भविष्य में मुकदमे की शुरुआत होने की संभावना कम है। उन्होंने यह भी कहा कि हालिया न्यायिक टिप्पणियां और फैसले परिस्थितियों में बदलाव को दर्शाते हैं, जिसके आधार पर नई जमानत याचिका पर विचार किया जाना चाहिए।
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार खालिद ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि यदि मुकदमा उचित समय में पूरा होने की संभावना नहीं है तो यूएपीए के तहत जमानत पर लगी कानूनी सीमाएं भी संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकतीं। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के एक मामले में कहा था कि जमानत सामान्य नियम है और आतंकवाद-रोधी कानून अनिश्चितकालीन हिरासत का साधन नहीं बनने चाहिए।
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि सह-अभियुक्त गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत प्रदान की गई थी। अदालत ने तब कहा था कि दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है और सभी अभियुक्तों की भूमिका समान नहीं मानी जा सकती।
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य कई लोगों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) तथा भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। जांच एजेंसियों का आरोप है कि वे फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा की कथित बड़ी साजिश का हिस्सा थे।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के दौरान भड़की इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।