नयी दिल्लीः देश की राजनीति में विपक्षी एकता को लेकर एक बार फिर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को मिली चुनावी हार और उसके बाद पार्टी के भीतर बढ़ी अस्थिरता के बीच कांग्रेस में क्षेत्रीय दलों के संभावित विलय की अटकलों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के नेताओं के हालिया बयानों ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद यह चर्चा और तेज हुई कि भाजपा के खिलाफ एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प तैयार करने के लिए कांग्रेस से अलग होकर बने कई क्षेत्रीय दल फिर से उसी छतरी के नीचे लौट सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए इस तरह के विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
गहलोत ने दिया 'घर वापसी' का सुझाव
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस से अलग होकर बने सभी क्षेत्रीय दलों को वापस कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए। उनका मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्षी एकता की सबसे बड़ी जरूरत है और सभी दलों को राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए एक मंच पर आना चाहिए।
नाना पटोले का दावा, बन रही है विलय की मानसिकता
महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने दावा किया कि शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे बड़े क्षेत्रीय नेता कांग्रेस के साथ आने की सोच रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश की संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए समान विचारधारा वाले दलों का एकजुट होना जरूरी है।
पटोले ने कहा कि देशभर में ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसमें कई क्षेत्रीय दल महसूस कर रहे हैं कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के साथ खड़ा होना समय की मांग है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस ने किसी दल को औपचारिक विलय का प्रस्ताव नहीं दिया है।
शरद पवार को आगे करने की मांग
शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने इस संभावित राजनीतिक पुनर्गठन में शरद पवार की भूमिका को अहम बताया है। उनका कहना है कि कांग्रेस से अलग होकर अस्तित्व में आए दलों को वापस कांग्रेस में लाने की पहल शरद पवार को करनी चाहिए।
राउत के मुताबिक, यदि कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े सभी राजनीतिक समूह एक मंच पर आते हैं तो यह भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकती है। उन्होंने कहा कि विपक्ष को मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस का मजबूत होना भी जरूरी है।
सुप्रिया सुले ने नहीं खोले पत्ते
विलय की चर्चाओं के बीच एनसीपी (एसपी) सांसद सुप्रिया सुले ने सीधे तौर पर किसी संभावना से इनकार भी नहीं किया और न ही पुष्टि की। उन्होंने कहा कि इस तरह की चर्चाओं को लेकर उनसे कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है।
जब उनसे पूछा गया कि भविष्य में कांग्रेस की ओर से विलय का प्रस्ताव आता है तो उनका रुख क्या होगा, इस पर उन्होंने हल्के अंदाज में कहा, "पहले बारिश तो होने दो, फिर देखेंगे छतरी लेनी है या रेनकोट।"
उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में 'दरवाजा खुला रखने' वाले संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
TMC के साथ मजबूती से खड़ी दिखी NCP
सुप्रिया सुले ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के प्रति समर्थन भी जताया। उन्होंने कहा कि राजनीति में किसी विचारधारा या नेता को समाप्त नहीं किया जा सकता और उनकी पार्टी टीएमसी के साथ मजबूती से खड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा राजनीतिक विवादों का समाधान लोकतांत्रिक और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए निकलेगा।
क्या बन रही है विपक्षी 'महाविलय' की पटकथा ?
फिलहाल कांग्रेस, टीएमसी और एनसीपी (एसपी) की ओर से किसी औपचारिक विलय की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रहे बयानों ने यह संकेत जरूर दिया है कि भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है।
यदि भविष्य में कांग्रेस से अलग होकर बने प्रमुख क्षेत्रीय दल एक बार फिर राष्ट्रीय पार्टी के साथ जुड़ते हैं, तो यह भारतीय राजनीति में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा विपक्षी पुनर्गठन साबित हो सकता है। हालांकि अभी यह पूरी तरह राजनीतिक अटकलों और नेताओं के संकेतों के स्तर पर ही है।