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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, गृहिणियों के श्रम को मिली बड़ी मान्यता

सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मौत पर मुआवजे का नया मानदंड तय

By प्रियंका महतो

Jun 11, 2026 18:34 IST

नई दिल्ली : गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू कार्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विवाह का अर्थ यह नहीं है कि घर में एक मुफ्त घरेलू सहायिका या परिचारिका नियुक्त कर ली गई हो। परिवार और समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जो महिलाएं घर और परिवार का प्रबंधन करती हैं, उन्हें केवल "होममेकर" या "गृहिणी" कहकर उनकी भूमिका को सीमित नहीं किया जा सकता। उनका योगदान घर की चारदीवारी से कहीं आगे तक फैला हुआ है और उन्हें वास्तव में "राष्ट्र निर्माता" कहा जाना चाहिए।

यह टिप्पणी गुरुवार को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।किस मामले की सुनवाई के दौरान आया यह फैसला?

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी एक सड़क दुर्घटना में मृत हुई गृहिणी के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। मृत महिला के परिजनों ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत निचली अदालत द्वारा निर्धारित मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क दुर्घटनाओं में गृहिणियों की मृत्यु या गंभीर चोट की स्थिति में मुआवजा तय करने के लिए नई दिशा-निर्देशात्मक व्यवस्था प्रस्तुत की। अदालत ने कहा कि अब तक ऐसे मामलों में गृहिणियों की काल्पनिक आय की गणना अकुशल या अर्ध-कुशल श्रमिकों के न्यूनतम वेतन के आधार पर की जाती थी, जो सामान्यतः 8,000 से 15,000 रुपये मासिक या उससे भी कम होती थी।

गृहिणियों के लिए न्यूनतम 30,000 रुपये मासिक आय का आधार

न्यायमूर्ति संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि गृहिणियों का अवैतनिक घरेलू श्रम भले ही पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देता, लेकिन वास्तव में वह देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष योगदान देता है। इसलिए दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु या घायल होने की स्थिति में मुआवजा तय करने के लिए पुराने मानदंड पर्याप्त नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि इससे गृहिणियों के योगदान का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता और उनके श्रम का अवमूल्यन होता है।

नई व्यवस्था के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु को केवल एक अकुशल श्रमिक की मृत्यु के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके बजाय इसे "घरेलू देखभाल और पारिवारिक संरक्षण की हानि" (लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर) के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि परिवार एक संरक्षक और देखभालकर्ता को खो देता है।

‘गृहिणी नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं महिलाएं’

अदालत ने कहा, “उन्हें केवल होममेकर कहने के बजाय राष्ट्र निर्माता कहा जाना चाहिए। गृहिणियां केवल भोजन बनाना या घर की सफाई नहीं करतीं, बल्कि वे परिवार का निर्माण करती है आने वाली पीढ़ियों को तैयार करती हैं और देश के विकास में योगदान देती हैं।

इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत सड़क दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु होने पर मुआवजा निर्धारित करने के लिए न्यूनतम 30,000 रुपये प्रतिमाह की आय को आधार माना जाए।

इसके साथ ही अदालत ने देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि इस प्रकार के मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जाए।

विवाह के बाद घर के काम केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं

इस मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक जीवन और घरेलू जिम्मेदारियों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि विवाह के बाद घर के सभी कामों का बोझ केवल पत्नी पर नहीं डाला जा सकता। गृहस्थी चलाना पति-पत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह के बाद किसी महिला की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, पेशेवर लक्ष्य या करियर संबंधी आकांक्षाएं समाप्त नहीं हो जातीं। यदि कोई महिला पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने पेशेवर जीवन में भी आगे बढ़ना चाहती है, तो इसे पति या ससुराल पक्ष के प्रति किसी प्रकार की "क्रूरता" नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञों ने फैसले को बताया ऐतिहासिक

कानूनी और सामाजिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह फैसला देश की करोड़ों महिलाओं के उस श्रम को मान्यता देता है, जिसे लंबे समय तक अदृश्य और मूल्यहीन माना जाता रहा। उनका कहना है कि पारंपरिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना में घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्य को कभी उचित स्थान नहीं मिल पाया।

विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने पहली बार गृहिणियों के घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन के लिए एक स्पष्ट और मापनीय आधार प्रस्तुत किया है।

साथ ही अदालत की यह टिप्पणी कि पत्नी को घरेलू परिचारिका समझना गलत है, समाज में मौजूद पुरुषवादी सोच के खिलाफ एक मजबूत कानूनी संदेश के रूप में भी देखी जा रही है। यह फैसला घरेलू श्रम, लैंगिक समानता और महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक भूमिका को लेकर न्यायपालिका की एक महत्वपूर्ण और दूरगामी पहल माना जा रहा है।

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