कोलकाताः पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में जिस मुद्दे की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह 19 सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक कथित पत्र है। दावा किया जा रहा है कि इस पत्र के जरिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से टीएमसी सांसदों के एक समूह को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया गया है।
यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह केवल तृणमूल कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम साबित हो सकता है। हालांकि पत्र की प्रामाणिकता और उसके औपचारिक रूप से लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय में जमा होने की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है।
विधानसभा चुनाव की हार के बाद बढ़ा असंतोष
2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में शानदार प्रदर्शन करते हुए 29 सीटें जीती थीं। लेकिन इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। अप्रैल-मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा और भारतीय जनता पार्टी ने 208 सीटों के साथ सत्ता हासिल कर ली। इसके साथ ही ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासन का अंत हो गया। तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों तक सिमट गई।
चुनावी हार के बाद संगठन और नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चाएं लगातार सामने आने लगीं। इसी पृष्ठभूमि में अब सांसदों के कथित पत्र ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है।
19 सांसदों के पत्र ने खड़े किए कई सवाल
बताया जा रहा है कि 18 मई 2026 को 19 सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय तक पहुंचा। पत्र में अलग संसदीय समूह की मान्यता और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ तालमेल की इच्छा जताने की बात कही गई है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं। पत्र की सत्यता, उसके आधिकारिक तौर पर जमा होने और उसमें शामिल सांसदों की अंतिम स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। फिर भी इसने राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है।
According to Sources here is the list of 19 out of 20 TMC breakaway MPs that sent their names to the Lok Sabha Speaker’s Office on May 18th.
— ANI (@ANI) June 12, 2026
1. Kakoli Ghosh Dastidar
2. Satabdi Roy
3. Bapi Haldar
4. Dr. Sharmila Sarkar
5. Prasun Bandyopadhyay
6. Jagadish Barma Basunia
7. Asit… pic.twitter.com/MM2rPhYuaf
किन सांसदों के नाम आ रहे हैं सामने?
रिपोर्टों के अनुसार इस कथित पत्र पर बारासात सांसद काकली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में कई सांसदों के हस्ताक्षर हैं। इनमें घाटाल से सांसद और अभिनेता दीपक अधिकारी (देव), बहारमपुर से यूसुफ पठान, सायोनी घोष, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, खलीलुर रहमान, अबू ताहिर खान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, जून मालिया और पार्थ भौमिक समेत अन्य नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों में हस्ताक्षरकर्ताओं की संख्या 19 के बजाय 20 भी बताई गई है, जिससे पूरे मामले को लेकर और अधिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा ध्यान घाटाल के सांसद और लोकप्रिय अभिनेता दीपक अधिकारी उर्फ देव के नाम पर गया है। कुछ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई एक बैठक में उनके शामिल होने की खबरें सामने आई थीं।
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हालांकि बाद में देव ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हुए कहा था कि उनका सम्मान और प्रेम जीवनभर बना रहेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह किसी नई राजनीतिक व्यवस्था या "नई तृणमूल" का हिस्सा नहीं बन रहे हैं।
ऐसे में कथित पत्र में उनका नाम सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में नए सवाल उठने लगे हैं कि आखिर उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति क्या है।
काकली घोष दस्तीदार की भूमिका केंद्र में
सूत्रों के अनुसार इस समूह की अगुवाई बारासात सांसद काकली घोष दस्तीदार कर रही हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने सांसदों के बीच संवाद स्थापित करने और अलग बैठकें आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उनका दावा है कि यह कदम सामूहिक विचार-विमर्श के बाद उठाया गया है। उन्होंने यह भी कहा है कि यह समूह जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए बंगाल के विकास के लिए नई राजनीतिक दिशा पर विचार कर रहा है।
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क्यों अहम है 19 का आंकड़ा?
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए 19 सांसदों का आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2024 के चुनाव में पार्टी ने 29 सीटें जीती थीं, लेकिन बशीरहाट के सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के निधन के बाद प्रभावी संख्या 28 रह गई।
यदि 28 में से 19 सांसद किसी अलग समूह के साथ खड़े होते हैं तो यह संख्या कुल सांसदों के दो-तिहाई के करीब पहुंच जाती है। यही वजह है कि इस आंकड़े पर राजनीतिक विश्लेषकों की खास नजर है।
दल-बदल कानून से क्या है संबंध?
भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून का विशेष महत्व है। संसदीय दल में विभाजन या विलय की स्थिति में दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण 19 सांसदों का समर्थन किसी भी संभावित राजनीतिक पुनर्गठन को कानूनी आधार देने के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इतनी संख्या वास्तव में किसी नए संसदीय समूह के साथ जाती है तो इससे उनकी सदस्यता पर तत्काल खतरा नहीं आएगा और वे अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं।
कथित तौर पर पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि सांसद जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। काकली घोष दस्तीदार ने भी मीडिया से बातचीत में भविष्य की राजनीतिक दिशा को एनडीए के अनुकूल बताया है।
यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोकसभा में भी राजनीतिक समीकरणों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
टीएमसी नेतृत्व ने क्या कहा?
तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया है। पार्टी के भीतर से इसे भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति और साजिश करार दिए जाने की बातें सामने आई हैं। वहीं कुछ सांसदों ने अपने नाम को लेकर सामने आ रही खबरों का खंडन भी किया है। उदाहरण के तौर पर प्रतिमा मंडल ने ऐसे दावों से खुद को अलग बताया है।
यही वजह है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कथित पत्र में शामिल सभी नाम वास्तव में इस पहल का समर्थन करते हैं या नहीं। फिलहाल पूरे मामले की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के संभावित रुख, सांसदों की आधिकारिक पुष्टि और तृणमूल कांग्रेस की आगामी रणनीति पर टिकी हुई हैं। यदि यह विभाजन औपचारिक रूप लेता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो सकती है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह केवल दबाव की राजनीति है या फिर तृणमूल कांग्रेस के भीतर स्थायी टूट की शुरुआत। लेकिन इतना तय है कि 19 सांसदों के कथित पत्र ने बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी है और आने वाले दिनों में इस पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।