रविवार (14 जून) की रात राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में दिलचस्प मोड़ आ गया। रविवार शाम तक सभी को यही लग रहा था कि तृणमूल कांग्रेस के 20–22 ‘बागी’ सांसद पार्टी से अलग होकर लोकसभा में एक अलग ब्लॉक बनाने जा रहे हैं। लेकिन कुछ ही घंटों बाद ही पूरा मामला ही पलट गया।
बागी खेमे की ओर से दावा किया गया कि दल-बदल विरोधी कानून की कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए उनके साथ मौजूद करीब 20 सांसदों ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नामक एक छोटे राजनीतिक पार्टी में विलय करने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि इस विलय की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ये सांसद NDA गठबंधन में शामिल होंगे।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर NCPI है कौन?
NCPI कौन है?
विकिपीडिया और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड से प्राप्त जानकारी के अनुसार नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) भारत की एक छोटी राजनीतिक पार्टी है। यह पार्टी रजिस्टर्ड तो है लेकिन मान्यता प्राप्त नहीं है। यह पार्टी मुख्य रूप से एक समाज कल्याण संस्था के रूप में काम करती है और जरूरतमंदों की सहायता करने का काम करता है।
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चुनावी राजनीति में भी अब तक NCPI की मौजूदगी बेहद सीमित रही है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कैलाशहर और चौमुनु (एसटी) विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन दोनों उम्मीदवारों को बहुत कम वोट मिले और पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। दोनों उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई थी।
#WATCH | Rebel TMC MPs met Lok Sabha Speaker Om Birla at his residence, in Delhi today
” ANI (@ANI) June 14, 2026
After meeting him, Rebel TMC MP Kakoli Ghosh Dastidar said, "We, the twenty MPs elected from the AITC, met the Speaker and submitted a letter requesting to sit separately; these twenty MPs pic.twitter.com/WNBTYStVEh
गौरतलब है कि उस समय इन दोनों सीटों पर तृणमूल ने भी अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे थे। इसके अलावा इस पार्टी की कोई खास राजनीतिक गतिविधि नजर नहीं आती है। यह पार्टी मुख्य रूप से त्रिपुरा की आंचलिक पार्टी के रूप में ही जानी जाती है। इस पार्टी का राष्ट्रीय या फिर राज्य स्तरीय न तो कोई बड़ा चेहरा है, न कोई स्पष्ट वैचारिक सिद्धांत और न ही पार्टी का आधिकारिक कोई वेबसाइट ही है।
13 अक्टूबर 2022 को जब पार्टी का रजिस्ट्रेशन हुआ था तब 'मिलेनियम पोस्ट' समाचार पत्र में हिंदी और अंग्रेजी भाषा में एक सार्वजनिक सूचना (Public Notice) प्रकाशित किया गया था। गौर करने वाली बात यह रही कि इस नोटिस में पार्टी ऑफिस का पता हावड़ा के बांकड़ा थाना क्षेत्र के नटपाड़ा गांव में बताया गया था।
इस नोटिस में कहा गया था : आम जनता की जानकारी के लिए सूचित किया जाता है कि ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ नामक एक राजनीतिक पार्टी के पंजीकरण का प्रस्ताव किया गया है। इस पार्टी का कार्यालय बिबरा, होल्डिंग नंबर-479, ग्राम नटपाड़ा, पोस्ट ऑफिस-बांकड़ा, थाना-बांकड़ा, जिला-हावड़ा, पिन-711403 में स्थित है।
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यदि ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ के पंजीकरण को लेकर किसी व्यक्ति को कोई आपत्ति हो, तो इस विज्ञप्ति के प्रकाशन की तिथि से 30 दिनों के भीतर अपनी आपत्ति भारत चुनाव आयोग, निर्वाचन सदन, अशोका रोड, नई दिल्ली-110001 को भेज सकता है।
साइराइल के उस पते का उपयोग करते हुए Nationalist Citizens Party of India नाम से एक फेसबुक पेज भी मौजूद है। उस पेज पर खुद को जरूरतमंद लोगों की सहायता करने वाला एक सामाजिक संगठन बताया गया है।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह फेसबुक पेज NCPI (नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) नामक राजनीतिक दल से आधिकारिक रूप से जुड़ा हुआ है या नहीं। दोनों के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं हो पाई है।
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला से मिलते तृणमूल के बागी सांसद युसूफ पठान, देव व अन्य Image - ANI
न कोई बड़ा चेहरा, न कोई पहचान... फिर NCPI क्यों ?
राष्ट्रीय स्तर तो दूर राज्य स्तर पर भी कोई खास राजनीतिक प्रभाव या पहचान न रखने वाली इस छोटी-सी पार्टी को तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने आखिर क्यों चुना? इस पर संवैधानिक और संसदीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून काफी सख्त है।
यदि असंतुष्ट सांसद केवल पार्टी छोड़कर एक अलग संसदीय समूह या ब्लॉक बनाते हैं तो उनके खिलाफ सांसद पद से अयोग्य घोषित किए जाने की कार्रवाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में उनकी लोकसभा सदस्यता भी खतरे में पड़ सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कानूनी समस्याओं से बचने का एक प्रमुख रास्ता यह है कि सांसद किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक पार्टी के साथ औपचारिक रूप से विलय कर लें। इसी कानूनी सुरक्षा कवच का उपयोग करते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले NDA में शामिल होने का रास्ता आसान बनाने के लिए तृणमूल के बागी सांसदों ने यह कदम उठाने की रणनीति अपनाई है।