ह्यूस्टन : पुर्तगाल ने फीफा विश्व कप में अपने अभियान की शुरुआत भले ही डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के खिलाफ 1-1 की निराशाजनक बराबरी के साथ की हो, लेकिन मैच के बाद सबसे ज्यादा चर्चा टीम के कप्तान क्रिस्टियानो रोनाल्डो के प्रदर्शन को लेकर हो रही है। 41 वर्षीय दिग्गज स्ट्राइकर पूरे मुकाबले में प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे, इसके बावजूद मुख्य कोच रॉबर्टो मार्टिनेज ने उन्हें पूरे 90 मिनट मैदान पर बनाए रखा। इसी फैसले को लेकर अब फुटबॉल जगत में सवाल उठने लगे हैं।
बुधवार का दिन विश्व फुटबॉल के कई बड़े सितारों के लिए यादगार रहा। किलियन एमबाप्पे ने दो गोल दागकर फ्रांस के इतिहास में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी का रिकॉर्ड अपने नाम किया। एर्लिंग हालांड ने विश्व कप पदार्पण मैच में ही दो गोल कर अपनी छाप छोड़ी। वहीं लियोनेल मेसी ने हैट्रिक लगाकर विश्व कप इतिहास के संयुक्त सर्वाधिक गोलदाताओं की सूची में जगह बना ली। लेकिन इसी दिन क्रिस्टियानो रोनाल्डो पूरी तरह फीके नजर आए। जिस मुकाबले में उनके पास नया रिकॉर्ड बनाने का अवसर था, उसमें वह एक भी शॉट गोल के भीतर नहीं रख सके।
कांगो के खिलाफ मुकाबले में रोनाल्डो का प्रदर्शन चिंता बढ़ाने वाला रहा। वह पूरे मैच में गोल के सामने लगभग निष्प्रभावी दिखे। लगातार दूसरे बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भी वह गोल करने में विफल रहे हैं। यूरो 2024 में भी उनके खाते में एक भी गोल नहीं आया था और अब विश्व कप के पहले मैच में भी वह गोल का खाता नहीं खोल सके।
रोनाल्डो के आंकड़े उनकी संघर्षपूर्ण स्थिति को और स्पष्ट करते हैं। पूरे मैच में उनका एक भी शॉट लक्ष्य पर नहीं गया। वह एक बार भी सफल ड्रिब्लिंग कर प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को पार नहीं कर सके। उन्होंने कुल 21 पास दिए, जिनमें से 16 पास पीछे की ओर थे। गोल की दिशा में केवल तीन प्रभावी पास दे सके। गेंद पर कब्जे की लड़ाई में भी उन्हें सिर्फ एक बार सफलता मिली। इतना ही नहीं, उन्हें मिले कुछ सुनहरे मौकों का भी वह फायदा नहीं उठा सके और गेंद गोलपोस्ट से बाहर चली गई। इन आंकड़ों से साफ है कि वह मैच पर कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
कतर विश्व कप में भी रोनाल्डो केवल एक गोल ही कर सके थे। बाद में नॉकआउट चरण में उन्हें शुरुआती एकादश से बाहर कर दिया गया था। उस विश्व कप के बाद पुर्तगाल के तत्कालीन मुख्य कोच फर्नांडो सैंटोस को भी पद छोड़ना पड़ा था। इसके बावजूद मौजूदा कोच रॉबर्टो मार्टिनेज ने कांगो के खिलाफ लगातार असफल रहने के बाद भी रोनाल्डो को मैदान से नहीं हटाया। गोल करने के अवसर गंवाने के अलावा वह टीम के आक्रमण को गति देने में भी मदद नहीं कर सके। मैच के दौरान कई बार ब्रूनो फर्नांडिस और जोआओ नेवेस समेत अन्य खिलाड़ियों के हावभाव से निराशा और असंतोष झलकता दिखाई दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि रोनाल्डो अपनी खेल शैली में आवश्यक बदलाव नहीं ला पाए हैं। दूसरी ओर लियोनेल मेसी ने उम्र और टीम की जरूरतों को देखते हुए अपने खेल में बदलाव किया है। अब वह केवल राइट विंगर की भूमिका तक सीमित नहीं रहते, बल्कि एक रचनात्मक प्लेमेकर के रूप में भी खेल का संचालन करते हैं और गहराई से आक्रमण तैयार करते हैं। रोनाल्डो हालांकि अब भी पारंपरिक स्ट्राइकर की भूमिका में ही बने हुए हैं। इसका असर पुर्तगाल के आक्रमण पर साफ दिखाई दे रहा है।
इसी वजह से पुर्तगाल की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि टीम को जरूरत पड़ने पर बदलाव करने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रोनाल्डो को पूरे मैच मैदान पर बनाए रखने का फैसला अब बहस का विषय बन गया है।
इसके साथ ही एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। रोनाल्डो की लोकप्रियता और टीम में उनके प्रभाव को देखते हुए कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उन्हें विशेष महत्व दिया जा रहा है। उनके अनुसार टीम के सबसे बड़े स्टार होने के कारण कोच रॉबर्टो मार्टिनेज के लिए उन्हें बाहर बैठाने या समय से पहले बदलने का फैसला लेना आसान नहीं है। यही वजह है कि कुछ लोग मानते हैं कि कोच के हाथ काफी हद तक बंधे हुए हैं।
हालांकि फुटबॉल प्रशंसकों के बीच इस मुद्दे पर बहस जारी है, लेकिन यह भी सच है कि क्रिस्टियानो रोनाल्डो अपने करियर में कई बार आलोचनाओं के बीच शानदार वापसी कर चुके हैं। उनके समर्थक उम्मीद लगाए बैठे हैं कि आगामी मुकाबलों में पुर्तगाल के कप्तान एक बार फिर अपने पुराने अंदाज में नजर आएंगे। अब सभी की निगाहें अगले मैच पर टिकी हैं, जहां यह देखना दिलचस्प होगा कि रोनाल्डो आलोचकों को जवाब दे पाते हैं या नहीं।