नई दिल्ली : देश में नवजात और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित होने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद (सीसीएचएफडब्ल्यू) के 16वें सम्मेलन के दौरान समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (एसएसबीएसके) का शुभारंभ करेंगे।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस कार्यक्रम की शुरुआत बच्चों को जन्म से लेकर 36 महीने की उम्र तक घर और समुदाय स्तर पर लगातार, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम होगी। यह पहल हर बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य, पोषण और विकास को सुनिश्चित करने के सरकार के लक्ष्य को आगे बढ़ाएगी।
एसएसबीएसके का आधार मंत्र 'पहले तीन साल संपूर्ण देखभाल' रखा गया है। इस सोच के तहत बच्चे के जीवन के शुरुआती तीन वर्षों को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही समय बच्चे के जीवित रहने, शारीरिक विकास, पोषण और मस्तिष्क के शुरुआती विकास के लिए सबसे अहम होता है।
यह नया कार्यक्रम देशभर में लागू होने वाला एकीकृत राष्ट्रीय कार्यक्रम होगा, जिसके तहत दो प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य पहलों-होम बेस्ड न्यूबॉर्न केयर (एचबीएनसी) और होम बेस्ड केयर फॉर यंग चाइल्ड (एचबीवाईसी)-को एक ही ढांचे में शामिल किया जाएगा। इससे बच्चे के जन्म से लेकर तीन साल तक लगातार स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था मजबूत होगी।
कार्यक्रम की खास बात यह है कि पहली बार नवजात और बच्चों के लिए जोखिम के आधार पर देखभाल की रणनीति अपनाई जाएगी। जिन बच्चों को स्वास्थ्य के लिहाज से 'जोखिम वाले' वर्ग में रखा जाएगा, उनकी अतिरिक्त निगरानी की जाएगी और जरूरत के अनुसार अधिक घरेलू दौरे किए जाएंगे।
मंत्रालय के मुताबिक जोखिम वाले नवजात शिशुओं के लिए जन्म के शुरुआती 42 दिनों में नौ तक घरेलू दौरे किए जाएंगे। वहीं जोखिम वाले छोटे बच्चों के लिए 36 महीने की उम्र तक आठ तक घरेलू दौरे की व्यवस्था होगी।
एसएसबीएसके के तहत देखभाल की निरंतरता बनाए रखने के लिए मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा), सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम), सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (एडब्ल्यूडब्ल्यू) के संयुक्त घरेलू दौरे को मजबूत किया जाएगा।
इसके अलावा प्रत्येक ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस (वीएचएसएनडी) पर वेल-बेबी सत्र आयोजित किए जाएंगे। वहीं आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में हर महीने शिशु शिविर लगाए जाएंगे, जहां जोखिम वाले बच्चों की समय पर पहचान, जांच और उपचार की व्यवस्था की जाएगी।
कार्यक्रम में माताओं के प्रसव बाद मानसिक स्वास्थ्य की जांच को भी सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल का हिस्सा बनाया जाएगा। इसके साथ ही प्रारंभिक बाल विकास (ईसीडी) को बढ़ावा देने के लिए बच्चों की देखभाल, शुरुआती सीखने की प्रक्रिया, उम्र के अनुसार खेल, सुरक्षा और परिवार की भागीदारी पर जोर दिया जाएगा।
सरकार डिजिटल तकनीक की मदद से भी इस कार्यक्रम को मजबूत करेगी। इसके लिए निर्णय सहायता प्रणाली (डीएसएस), चाइल्ड ट्रैकिंग एप्लीकेशन, रेफरल सिस्टम और अलर्ट मैकेनिज्म का उपयोग किया जाएगा। ये डिजिटल सेवाएं जननी पोर्टल, यू-विन पोर्टल, एमपीसीडीएसआर पोर्टल, आरबीएसके 2.0 पोर्टल और पोषण ट्रैकर से जुड़ी होंगी।
इन डिजिटल व्यवस्थाओं के माध्यम से आभा (एबीएचए) और बाल-आभा आईडी के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं और आंकड़ों का बेहतर समन्वय किया जाएगा। कार्यक्रम में शहरी क्षेत्रों के लिए भी विशेष रणनीति तैयार की गई है, जिसमें झुग्गी क्षेत्रों, प्रवासी परिवारों और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित लोगों पर ध्यान दिया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि एसएसबीएसके डिजिटल दौर की नई चुनौतियों को भी ध्यान में रखेगा। इसमें बच्चों के लिए उम्र के अनुसार खेल, शारीरिक गतिविधियों और मानसिक विकास को बढ़ावा देने पर जोर होगा। साथ ही अत्यधिक स्क्रीन टाइम और कम शारीरिक गतिविधि से बच्चों के मस्तिष्क विकास, भावनात्मक स्वास्थ्य और सामाजिक कौशल पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर भी जागरूकता बढ़ाई जाएगी।
समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत के साथ सरकार का लक्ष्य हर मां और बच्चे को समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। यह पहल विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास मानी जा रही है।