नई दिल्लीः एसिड हमलों के बढ़ते मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों में सजा को और कड़ा करने पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही यह सुझाव भी दिया गया कि कानून में बदलाव कर अभियुक्तों पर अपनी बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी डालने पर भी विचार हो सकता है।
आमतौर पर आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोप साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है, लेकिन अदालत ने संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में अलग दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत हो सकती है।
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, तब तक जिन लोगों को जबरन एसिड पिलाया गया है या जिन्हें अंदरूनी चोटें आई हैं, भले ही बाहरी रूप से कोई विकृति न दिखे, उन्हें भी दिव्यांग अधिकार कानून 2016 के तहत एसिड अटैक पीड़ित माना जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कान्त और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बाकची के पीठ ने कहा कि इस स्पष्टीकरण को कानून लागू होने की शुरुआत से ही प्रभावी माना जाएगा और संबंधित मंत्रालय से इसे औपचारिक रूप से अधिसूचित करने का आग्रह किया। यह निर्देश उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसे एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक ने दायर किया है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे पीड़ितों को दिव्यांग की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मौजूदा सजा इन अपराधों को रोकने में पर्याप्त प्रभावी साबित नहीं हो रही है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि 2013 के बाद से ऐसे मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है, जो चिंताजनक है। पीठ ने सुझाव दिया कि दोषी पाए जाने वाले लोगों की संपत्ति जब्त कर पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर भी विचार होना चाहिए। इसके अलावा बाजार में एसिड की बिक्री पर सख्त नियंत्रण की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि संबंधित मंत्रालय ने पहले ही कानून में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया है।
अदालत ने कहा कि जब तक संशोधन लागू नहीं होता, तब तक एसिड पिलाए जाने या अंदरूनी क्षति झेलने वाले सभी लोगों को भी एसिड अटैक पीड़ित की श्रेणी में शामिल माना जाएगा ताकि उन्हें कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों का लाभ मिल सके। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की गई है। इससे पहले भी अदालत ने देशभर में लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए उच्च न्यायालयों को समयसीमा तय करने का निर्देश दिया था और राज्यों से ऐसे मामलों के आंकड़े व पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़ी जानकारी मांगी थी।