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विधानसभा चुनावों में घटा ‘नोटा’ का असर, असम को छोड़ किसी भी राज्य में नहीं पार कर पाया 1 प्रतिशत का आंकड़ा

बंगाल, पुडुचेरी, केरल और तमिलनाडु में ‘नोटा’ का सीमित प्रभाव, मतदाता सीधे दलों को दे रहे प्राथमिकता।

By रजनीश प्रसाद

May 04, 2026 17:54 IST

नई दिल्ली : हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि मतदाताओं के बीच ‘नोटा’ (इनमें से कोई नहीं) विकल्प की लोकप्रियता कम हो रही है। असम को छोड़कर किसी भी राज्य में यह आंकड़ा एक प्रतिशत से ऊपर नहीं पहुंच पाया है।

आंकड़ों के अनुसार, असम इस सूची में सबसे आगे है, जहां 1.29 प्रतिशत मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (ईवीएम) पर नोटा का बटन दबाया। 126 सीटों वाले असम विधान सभा चुनाव में अब तक 13 सीटों के परिणाम घोषित हो चुके हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी ने 11 सीटों पर जीत दर्ज की है जबकि बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को एक-एक सीट मिली है। रुझानों में भाजपा 71 सीटों पर और कांग्रेस 19 सीटों पर आगे चल रही है।

पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है, जहां 0.81 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का उपयोग किया। 294 सदस्यीय विधान सभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है। रुझानों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी 194 सीटों पर आगे है जबकि अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस 92 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी को इस बार कड़ी चुनौती मिल रही है।

तीसरे स्थान पर पुडुचेरी रहा, जहां 0.73 प्रतिशत मतदाताओं ने इस विकल्प को चुना। यहां ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बहुमत के साथ सत्ता में बना रहने की ओर अग्रसर है। एआईएनआरसी 9 सीटें जीत चुकी है और एक सीट पर आगे है जबकि उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी 2 सीटें जीतकर 5 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।

केरल में 0.58 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना, जबकि तमिलनाडु में यह आंकड़ा 0.41 प्रतिशत रहा।

तमिलनाडु में चुनावी मुकाबले के बीच नई पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) ने जोरदार प्रदर्शन किया है। 233 सीटों में से 109 सीटों पर बढ़त के साथ यह पार्टी चर्चा में है। पार्टी अब तक 3 सीटें जीत चुकी है और 104 सीटों पर आगे चल रही है। पार्टी के नेता विजय पेरम्बूर और तिरुचिरापल्ली पूर्व दोनों सीटों पर आगे हैं।

कुल मिलाकर इन चुनावी आंकड़ों से संकेत मिलता है कि मतदाता अब नोटा के बजाय सीधे उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिससे इस विकल्प का प्रभाव लगातार घटता जा रहा है।