इस्लामाबादः पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में आवारा कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाएं अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी हैं। हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्षों में पांच लाख से अधिक लोग कुत्तों के काटने का शिकार हुए हैं-जो प्रशासनिक चुनौतियों और नीति क्रियान्वयन की कमियों की ओर संकेत करते हैं।
बढ़ती घटनाएं: आंकड़ों से झलकती गंभीरता
2024 और 2025 में लगातार बढ़ते मामलों ने यह साफ कर दिया है कि समस्या नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। 2026 के शुरुआती महीनों में ही हजारों नए मामले सामने आना इस बात का संकेत है कि मौजूदा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। डेरा गाजी खान, रहीम यार खान और फैसलाबाद जैसे जिले ‘हॉटस्पॉट’ के रूप में उभरकर सामने आए हैं, जहां स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। यह असमान भौगोलिक वितरण इस ओर इशारा करता है कि स्थानीय स्तर पर संसाधनों और नियंत्रण उपायों में अंतर हो सकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव
इतनी बड़ी संख्या में डॉग बाइट के मामलों का सीधा असर स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ता है। एंटी-रेबीज टीकों की उपलब्धता बनाए रखना और समय पर उपचार देना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि प्रशासन ने दावा किया है कि पर्याप्त वैक्सीन उपलब्ध है, लेकिन असल सवाल यह है कि क्या ये संसाधन समय पर और सही स्थानों तक पहुंच पा रहे हैं? ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच इस समस्या को और जटिल बना देती है। यदि प्राथमिक स्तर पर इलाज में देरी होती है तो रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
नीति बनाम क्रियान्वयन की खाई
पंजाब में ‘डॉग्स बर्थ कंट्रोल पॉलिसी 2021’ जैसी नीतियां पहले से मौजूद हैं, लेकिन अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा-यह दर्शाता है कि क्रियान्वयन में कहीं न कहीं कमी है। लाहौर हाई कोर्ट द्वारा लिखित आश्वासन की मांग इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
विवादित नियंत्रण उपाय और नैतिक सवाल
जोहर टाउन में कुत्तों को मारने की कार्रवाई को लेकर विवाद ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। गोलीबारी जैसे तरीकों का इस्तेमाल न केवल नैतिक बहस को जन्म देता है, बल्कि इससे आम लोगों में भय और असुरक्षा की भावना भी पैदा होती है। यह सवाल उठता है कि क्या समस्या का समाधान केवल कठोर कार्रवाई से संभव है, या फिर इसके लिए दीर्घकालिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है?
समाधान की दिशा: संतुलित रणनीति की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति जरूरी है। इसमें कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, कचरा प्रबंधन और जन-जागरूकता अभियान शामिल होने चाहिए। सिर्फ कुत्तों को हटाने या मारने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता, बल्कि इससे पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।