तेहरान : पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। खासकर हर्मुज जलसंधि के बंद होने के बाद क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में जिन देशों को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है, जैसे भारत वे मुश्किल में हैं।
कई देशों ने ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की है, तो कुछ ने नागरिकों की सुरक्षा और बाजार स्थिरता के लिए विशेष कदम उठाए हैं।
मुख्य देशों की रणनीतियां :
ऑस्ट्रेलिया : घरेलू स्टॉक से पेट्रोल और डीजल उपलब्ध कराकर घरेलू कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखा।
मलेशिया : पेट्रोल पर सब्सिडी बढ़ाई और उर्वरक की आपूर्ति सुनिश्चित की।
बांग्लादेश : ईंधन और एलएनजी आयात के लिए विदेशी मुद्रा जुटाने की कोशिश की और भारत से भी डीजल खरीदा।
ब्राजील : डीजल आयात में राज्यों को सब्सिडी देने की योजना बनाई, केंद्रीय कर हटाया और तेल निर्यात पर 12% कर लगाया।
दक्षिण कोरिया : कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन की सीमाओं को ढीला किया और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का उपयोग बढ़ाकर 80% तक कर दिया।
चीन : परिष्कृत ईंधन का निर्यात रोक दिया और आपातकालीन स्टॉक से बाजार में आपूर्ति की।
जापान : एक साल के लिए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के संचालन नियमों में ढील दी और ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी की अतिरिक्त आपूर्ति की कोशिश की।
यूरोपीय संघ (EU) : बिजली कर और ग्रिड शुल्क में कटौती की और राज्य सहायता की घोषणा की।
अर्जेंटीना : तरल ईंधन और कार्बन डाइऑक्साइड पर लगाए गए कर को फिलहाल स्थगित किया।
इंडोनेशिया : कोयला उत्पादन बढ़ाया और 1 जुलाई से B50 ( 50% पाम ऑयल आधारित बायोडीजल) लागू किया।
वियतनाम : निर्धारित समय से पहले पूरी तरह इथेनॉल मिश्रित गैसोलीन का उपयोग शुरू किया।
दक्षिण अफ्रीका : एक महीने के लिए ईंधन लेवी कम की।
ग्रीस : अप्रैल और मई में ईंधन और उर्वरक पर सब्सिडी दी और फेरी टिकटों पर छूट की घोषणा की।
इस संकट के बीच हर देश अपनी परिस्थितियों और संसाधनों के अनुसार रणनीति अपना रहा है ताकि नागरिकों पर प्रभाव कम से कम पड़े।