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Bengal Election: शमिक भट्टाचार्य का दावा: सत्ता में आने पर बंगाल से ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ खत्म करेगी भाजपा

भाजपा का दावाः सत्ता में आने पर घुसपैठ रोकेंगे, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण खत्म करेंगे, महिलाओं और आदिवासी सुरक्षा पर विशेष ध्यान देंगे।

By श्वेता सिंह

Apr 04, 2026 20:48 IST

कोलकाता: विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही राज्य की राजनीति का फोकस तेजी से बदल रहा है। जहां पहले चुनावी बहस का केंद्र सड़क, बिजली, पानी, रोजगार और स्थानीय विकास हुआ करता था। वहीं अब पहचान, सुरक्षा और सामाजिक संतुलन जैसे विषय प्रमुख हो गए हैं।

राजनीतिक दल इन मुद्दों को अलग-अलग तरीके से परिभाषित कर रहे हैं। भाजपा इन्हें राज्य के भविष्य से जुड़ा अहम सवाल बता रही है। हालांकि सत्तारूढ़ दल इसे ध्यान भटकाने की कोशिश करार देता है और अपनी विकास योजनाओं को प्रमुखता देता है। इससे साफ है कि इस बार चुनावी विमर्श दो अलग दिशाओं में बंटता नजर आ रहा है।

चुनावी समीकरण: मुकाबला दिलचस्प होगा

चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। हालिया ओपिनियन पोल में तृणमूल कांग्रेस को 174 से 184 सीटों के साथ बढ़त मिलती दिख रही है, जबकि भाजपा 108 से 118 सीटों तक पहुंच सकती है।

हालांकि 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 215 सीटों के साथ एकतरफा जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार भाजपा अपने वोट प्रतिशत और सीटों दोनों में बढ़ोतरी का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा अपने मुद्दों को मतदाताओं तक प्रभावी तरीके से पहुंचा पाती है, तो मुकाबला पहले से ज्यादा कड़ा हो सकता है।

भाजपा का रुख: वैचारिक संघर्ष का दावा

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने चुनाव को “वैचारिक लड़ाई” का रूप दिया है। उनके अनुसार, यह केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन को बचाने का सवाल है।

शमिक भट्टाचार्य का कहना है कि पार्टी की प्राथमिकता केवल विकास तक सीमित नहीं है। पार्टी समाज में संतुलन, सुरक्षा और पारदर्शिता स्थापित करना चाहती है। इसीलिए भाजपा ने अपने चुनावी एजेंडे में पहचान और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुख स्थान दिया है।

‘लव जिहाद’ पर सख्ती की बात

भाजपा ने ‘लव जिहाद’ को महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक विश्वास से जोड़कर चुनावी मुद्दा बनाया है। शमिक भट्टाचार्य का आरोप है कि कुछ मामलों में पहचान छिपाकर संबंध बनाए जाते हैं, जिससे बाद में विवाद और कथित धर्मांतरण की स्थिति पैदा होती है।

पार्टी का कहना है कि यदि वह सत्ता में आती है, तो ऐसे मामलों में विशेष निगरानी तंत्र बनाया जाएगा, पुलिस और प्रशासन को अधिक अधिकार दिए जाएंगे और कानूनी कार्रवाई को सख्त किया जाएगा।

हालांकि इस मुद्दे पर विपक्षी दल और कई सामाजिक समूह यह तर्क देते हैं कि ऐसे मामलों को सामान्य कानून के तहत ही देखा जाना चाहिए और इसे व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं है।

‘लैंड जिहाद’: जमीन और स्थानीय अधिकार

‘लैंड जिहाद’ को भाजपा ने एक नए और महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे के रूप में पेश किया है। शमिक भट्टाचार्य का आरोप है कि सीमावर्ती और आदिवासी इलाकों में योजनाबद्ध तरीके से जमीन पर कब्जा किया जा रहा है, जिससे स्थानीय आबादी के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

भाजपा का कहना है कि यह केवल भूमि विवाद का मामला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर नियंत्रण का सवाल है। भाजपा ने संकेत दिया है कि सत्ता में आने पर भूमि रिकॉर्ड की व्यापक जांच, अवैध कब्जों पर कार्रवाई और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन पर बहस

घुसपैठ का मुद्दा भाजपा के अभियान का सबसे संवेदनशील और प्रमुख हिस्सा है। भारत-बांग्लादेश सीमा की लंबाई 4,096 किमी है, जिसमें पश्चिम बंगाल का हिस्सा लगभग 2,216 किमी है।

भाजपा का आरोप है कि सीमावर्ती जिलों-मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना में अवैध घुसपैठ के कारण जनसंख्या संरचना में बदलाव हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार, 1951 में राज्य में मुस्लिम आबादी 19.85 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 27.01 प्रतिशत हो गई।

भाजपा इसे आंतरिक सुरक्षा, संसाधनों पर दबाव और सांस्कृतिक संतुलन से जोड़ती है। हालांकि विपक्ष इन दावों को राजनीतिक करार देते हुए कहता है कि जनसंख्या परिवर्तन कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से होता है, न कि केवल घुसपैठ से।

अल्पसंख्यक तुष्टीकरण पर आरोप-प्रत्यारोप

भाजपा का आरोप है कि राज्य सरकार “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” की राजनीति कर रही है, जिससे प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होती है।

शमिक भट्टाचार्य के अनुसार, नीतियां सभी वर्गों के लिए समान होनी चाहिए। किसी एक समुदाय को विशेष लाभ देना संतुलन को बिगाड़ता है।

वहीं सत्तारूढ़ दल इस आरोप को खारिज करते हुए कहता है कि उसकी नीतियां सामाजिक न्याय और समावेशी विकास पर आधारित हैं। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच गहरी राजनीतिक खाई नजर आती है।

SIR और मतदाता सूची पर विवाद

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर भी राजनीतिक टकराव बढ़ा है। फरवरी 2026 तक 60 लाख से अधिक मामलों की समीक्षा की गई, जिनमें से 52 लाख का निपटारा किया जा चुका है।

भाजपा इसे मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने का प्रयास मानती है। पार्टी का कहना है कि इससे फर्जी मतदाताओं की पहचान होगी और चुनाव प्रक्रिया मजबूत होगी।

दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए कुछ वर्गों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

वैश्विक मुद्दों से जोड़ने की कोशिश

शमिक भट्टाचार्य ने अपने बयानों में धार्मिक कट्टरता और उग्रवाद को वैश्विक चुनौती बताते हुए कहा कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि दुनिया के कई हिस्सों में कट्टरता के कारण सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है, और लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए संतुलन और सतर्कता जरूरी है।

किस दिशा में जाएगा चुनाव ?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार मुद्दों का स्वरूप स्पष्ट रूप से बदल गया है। जहां भाजपा पहचान, सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रही है, वहीं सत्तारूढ़ दल विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दे रहा है। अंततः यह मतदाताओं पर निर्भर करेगा कि वे किस एजेंडे को प्राथमिकता देते हैं। चुनावी नतीज यह तय करेंगे कि राज्य की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

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