बांग्ला फिल्मों के सुपरस्टार या यूं कहा जाए कि अपने आप में ही एक इंडस्ट्री लेकिन दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले बुम्बादा...यानी प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय। अंतर्राष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला 2026 में एई समय के स्टॉल पर बतौर विशेष अतिथि पहुंचे प्रसेनजीत ने अपनी हालिया रिलीज फिल्म 'विजयनगरेर हीरे' (विजयनगर का हीरा) के बारे में खुलकर बात की।
यह फिल्म प्रसेनजीत चटर्जी की 'काकाबाबु' फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म है। बातों-बातों में प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय ने इस बात का भी खुलासा किया कि काकाबाबु सीरिज की फिल्मों के हिंदी भाषा (बॉलीवुड) में बनने के बारे में वह क्या सोचते हैं और अगर ऐसा हुआ तो क्या वह बॉलीवुड में बनने वाली फिल्म का भी हिस्सा बनेंगे?
बता दें, इस फ्रेंचाइजी की फिल्में बांग्ला साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास से प्रेरित है। रहस्य और रोमांचक फिल्मों की इस फ्रेंचाइजी की पहली फिल्म 'मिशर रहस्य' साल 2013 में और दूसरी फिल्म 'येती अभिजान' (येती अभियान) साल 2022 में रिलीज हुई थी। दोनों फिल्में ही ब्लॉकबस्टर रही। अब प्रसेनजीत एक बार फिर से इस फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म 'विजयनगरेर हीरे' लेकर खासतौर पर युवा दर्शकों के सामने उपस्थित हुए हैं।
इस बार विजयनगर गए, वहां कौन सा हीरा मिला?
विजयनगर, हम्पी और भी कई जगहों पर गया। मुझे लगता है कि फिल्म को देखकर हर बांग्लाभाषी सिनेमाहॉल से हीरा लेकर ही वापस लौट रहा है, क्योंकि जो वाह-वाही हो रही है वह उनके लिए किसी हीरे से कम नहीं है। एक और बात साबित हुई कि पीढियों दर पीढ़ी काकाबाबु और संतु (फिल्म के दो प्रमुख किरदार) को देखने के लिए पहुंच रहे हैं।
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कल मैं मुंबई में था। वहां भी फिल्म हाउसफुल रही, एक भी टिकट उपलब्ध नहीं था। मैं पिछले 10 सालों से यह किरदार निभा रहा हूं। काकाबाबु और संतु को लोग पीढ़ियों से इतना प्यार करते हैं कि उन्हें भी इस बारे में पता नहीं है।

आप पहले से अधिक युवा और फिट लग रहे हैं। क्या यह एवरग्रीन काकाबाबु का ही असर है?
काफी लोगों ने मुझसे यहीं सवाल पूछा है। लोग यह कह रहे हैं काकाबाबु युवा होते जा रहे हैं और संतु बड़ा होता जा रहा है। वास्तव में पिछले 13 सालों से खुद को मेंटेन रखना ही एक बड़ी चुनौती है। मैं फिल्मों के बीच में कम से कम डेढ़ सालों का समय लेने की कोशिश करता हूं। खुद को मानसिक तौर पर तैयार भी करता हूं।
'विजयनगरेर हीरे' फिल्म का फाइनल स्क्रिप्ट तैयार करने में ही डेढ़ सालों का समय लग गया था। उसके बाद हमने फिल्म की शूटिंग शुरू की, आउटडोर पर गए। हम्पी एक शानदार जगह है...वहां हर तरफ इतिहास बिखरे पड़े हैं। वहां जाकर शूटिंग करना, उसका एक अलग ही अनुभव रहा है।
जो इतिहास हमने किताबों में पढ़ा था, उसे सामने देखकर हम उसे देखने में मशगूल हो जाते थे। बड़ों के साथ-साथ बच्चों में भी इतिहास के प्रति काफी उत्सुकता जाग रही है। वे इसे लेकर सवाल पूछ रहे हैं। मैंने कई बच्चों से बात की और वे इतिहास को लेकर बिल्कुल सही सवाल पूछ रहे हैं। 'विजयनगरेर हीरे' देखने के बाद बच्चों ने सवाल पूछना शुरू किया है।
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किशोरों के लिए अब फिल्में क्यों नहीं बन रही है जैसा कई सालों पहले तक हुआ करता था?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अब बाल साहित्य को लेकर काम नहीं होता है। हमारे पास बाल साहित्य का विशाल भंडार है। बीच-बीच में कोशिशें भी की जाती हैं लेकिन उसकी स्वीकार्यता अधिक नहीं होती है। मैंने एक प्रकार से जिद्द करके ही सुनील दा (गंगोपाध्याय) से काकाबाबु को लिया था। इसलिए इस किरदार के प्रति मेरी जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी बन जाती है।
13 साल पहले जब काकाबाबु सीरिज की पहली फिल्म रिलीज हुई थी, तब भी मैंने जिम्मेदारी के साथ ही वह किरदार निभाया था। आज भी मैं उसी जिम्मेदारी के साथ काकाबाबु को वापस ला रहा हूं क्योंकि मेरी जिम्मेदारी सिर्फ एक फिल्म के प्रति नहीं है बल्कि इसमें सुनील दा, हमारा साहित्य, हमारा इतिहास सब कुछ जुड़ा हुआ है।
सुनील गंगोपाध्याय लिखित एक और काकाबाबु की स्क्रिप्ट पूरी तरह से तैयार है। उसपर कल से शूटिंग शुरू हो सकती है लेकिन हम सबको यह लगा कि 'विजयनगरेर हीरे' की कहानी अधिक मजबूत है। यह लोगों को अधिक पसंद आएगी। सुनील दा के शुरुआती 5-10 सर्वश्रेष्ठ काकाबाबु की कहानियों में से एक है 'विजयनगरेर हीरे'। बाल साहित्य के इन सुपरहीरो की मौत नहीं होती है। बस यह समझने की जरूरत होती है कि कैसे इन फिल्मों को दिलचस्प तरीके से, पूरी तरह से समर्पित होकर बच्चों और किशोरों के लिए बनाया जा सकता है।
हमने पिछले 1 महीने में इस फिल्म को सिर्फ स्कूलों के बच्चों के सामने प्रमोट किया है। आप कैसे एक फिल्म को प्रमोट करते हैं उसे समझने की जरूरत है। बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी के साथ इस फिल्म को देखने जा रहे हैं। जिनसे किसी समय काकाबाबु की कहानियां सुनी थी, अब उनके साथ इसे बड़े पर्दे पर अनुभव करने के लिए बच्चे सिनेमाहॉल पहुंच रहे हैं। अगर फिल्मों को साफ दिल से बनाया जाता है तो दर्शक सिनेमाहॉल में जाकर उस बात को अनुभव करते हैं और उसे स्वीकार भी करते हैं।
क्या आपको लगता है कि काकाबाबु के ब्रांड को और बड़ा बनाने के लिए इस फिल्म को हिंदी भाषा में भी बनाना चाहिए?
मैं कोई छिपी-छिपाई बात नहीं करना चाहता हूं। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन मुंबई के कुछ बड़े-बड़े स्टार जो मेरे हमउम्र हैं, उन्होंने मुझसे सीधा संपर्क करके पूछा है कि क्या हम काकाबाबु का हिंदी में फ्रेंचाइजी बना सकते हैं? कल अगर काकाबाबु राष्ट्रीय स्तर (बॉलीवुड) पर बनता है...वे बड़े स्टार हो सकते हैं लेकिन काकाबाबु को तो मैं नहीं छोड़ूंगा...! मेरी कोई आपत्ति नहीं है लेकिन काकाबाबु को मैं नहीं छोड़ने वाला हूं। कुल मिलाकर मुझे लगता है कि क्यों नहीं बन सकता है या बनना चाहिए।
हम बंगाल में रहकर ऐसी फिल्में, ऐसे विजुअल बना सकते हैं कि पैन इंडिया फिल्मों में उसकी चर्चाएं हो रही है। काकाबाबु से अधिक जमीन से जुड़ा हुआ कोई फिल्म नहीं हो सकता है। हर फिल्म का अलग इतिहास है, बैकग्राउंड म्यूजिक अलग होता है। हमारी इस फिल्म का म्यूजिक दक्षिण भारतीय है। इसमें कन्नड़ भाषा भी है, मैंने खुद कन्नड़ में डायलॉग बोला है। इस फिल्म में एक अलग ही फ्लेवर डाला गया है।

अगर काकाबाबु हिंदी में बनती है तो आप काकाबाबु को नहीं छोड़ रहे हैं और शायद काकाबाबु भी आपको नहीं छोड़ेंगे...!
मैं हिंदी को अलग भाषा के तौर पर नहीं देखता हूं। मेरा मानना है कि बांग्ला जैसी क्षेत्रीय भाषा में फिल्म बनाकर भी हम उसे पैन इंडिया ले जा सकते हैं। यहीं मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अगर 2 सालों बाद मैं फिर से काकाबाबु बनाता हूं तब भी मैं उसी तरह से सोचूंगा कि बांग्ला में फिल्म बनाकर उसे राष्ट्रीय स्तर पर ले जा सकूं।
अब इसकी जगह काफी हद तक तैयार हो चुकी है। लोकल से ग्लोबल जा सकते हैं। जब ऋतु (ऋतुपर्णो घोष) ने रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास के आधार पर 'चोखेर बाली' बनाया था, तब उसे सिर्फ बंगाल नहीं बल्कि देश के हर व्यक्ति ने देखा था। 'चोखेर बाली' मेरी बहुत बड़ी पहचान है...आपने वह चोखेर बाली किया न।
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आसपास की स्थिति देखकर दिल उदास होता है?
हम सबका दिल उदास होता है। परिवार में जो हो रहा है उसे देखकर भी कई बार अच्छा नहीं लगता है। कभी-कभी लगता है कि बाहर चले जाएं लेकिन जो कुछ हो रहा है उसे लेकर मैं बहुत खुश हूं, ऐसा नहीं कहूंगा। मैं बहुत सकारात्मक व्यक्ति हूं। मैं बार-बार यहीं कहता हूं कि सुबह ब्रेकफास्ट से शुरू करें और रात को डिनर तक साथ रहे। आपलोगों की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। हम सबको साथ में रहना होगा, खासतौर पर हम जिस इंडस्ट्री में काम करते हैं। टीम वर्क आम जनता को समझ में आता है।
जो युवा इंडस्ट्री का हिस्सा बनना चाहते हैं लेकिन डरे हुए होते हैं...उनसे क्या कहेंगे?
मुझे इस बारे में अलग से कुछ नहीं कहना है। जो लोग फिल्म इंडस्ट्री में आना चाहते हैं, उनसे यहीं कहूंगा कि पूरी दुनिया में अगर किसी को 7 दिन का मौका भी मिलता है तो वह ऑडियो-विजुअल का कोर्स कर रहा है। हम आज जितना देख रहे हैं, 5-10 सालों बाद ऑडियो-विजुअल उससे कहीं ज्यादा आगे जाने वाला है। ऐसा सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया में होगा। अगर फिल्म बनाना चाहते हैं तो अब मौके काफी ज्यादा हैं।
पहले हम सिर्फ फिल्मों पर ही निर्भर करते थे लेकिन अब फिल्म, शॉर्ट फिल्म, माइक्रो फिल्म...कहानी कहने के कई तरीके हैं। आपको फोकस करने की जरूरत है। सबसे जरूरी है एक व्यक्ति के तौर पर अनुशासन में रहना और अपने काम को (निर्देशन, संगीत या जो भी काम हो) मंदिर समझे। इसके बाहर कुछ सोचने की जरूरत नहीं है। कभी दुःख होगा, कष्ट होगा, हार भी जाएंगे लेकिन फिल्म अचानक 5 सालों बाद आपको वह लौटा सकती है जिसके बारे में आपने सपने में भी नहीं सोचा होगा। इसके लिए ही आपको लड़ना होगा।
बता दें, प्रसेनजीत चट्टोपाध्याय को इस साल केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। इसलिए हमारे अपने बुम्बादा या यूं कहें पद्मश्री 'काकाबाबु' को पद्म पुरस्कार मिलने पर समाचार एई समय परिवार की ओर से हार्दिक बधाई और उनकी फिल्म के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।