नई दिल्लीः भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने में फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि इसके व्यापक उपयोग के लिए केवल वाहन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ईंधन आपूर्ति, उपभोक्ता जागरूकता, मूल्य निर्धारण और अधिक मॉडलों की उपलब्धता सहित एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना आवश्यक होगा।
मारुति सुजुकी इंडिया के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हिसाशी ताकेउची ने कंपनी की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार के परिचय कार्यक्रम में कहा कि यह तकनीक भारत के दो बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों-कच्चे तेल के आयात में कमी और कार्बन उत्सर्जन घटाने को एक साथ हासिल करने में सक्षम है।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसे आंतरिक दहन इंजन से लैस होते हैं, जो पेट्रोल के साथ इथेनॉल या मेथेनॉल मिश्रित वैकल्पिक ईंधन पर भी संचालित हो सकते हैं। ताकेउची के अनुसार, इसके लाभ केवल ऑटोमोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि किसानों, इथेनॉल उत्पादकों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और देश की समग्र आर्थिक संरचना तक पहुंचते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान समय में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा सुरक्षा को तेज गति और बड़े पैमाने पर हासिल करना जरूरी है। उनका मानना है कि आयातित कच्चे तेल पर दीर्घकालिक निर्भरता टिकाऊ विकल्प नहीं हो सकती और देश को ऐसे समाधान अपनाने होंगे जो स्वच्छ, किफायती, विस्तार योग्य और घरेलू संसाधनों पर आधारित हों।
ताकेउची ने कहा कि फ्लेक्स-फ्यूल इन आवश्यकताओं को पूरा करता है और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को मजबूत बनाता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके बड़े पैमाने पर प्रसार के लिए सभी हितधारकों को मिलकर काम करना होगा। ईंधन वितरण नेटवर्क, वाहन मॉडल, उपभोक्ता विश्वास और मूल्य संरचना जैसे पहलुओं पर समानांतर रूप से काम करना जरूरी है।
मारुति सुजुकी ने इसी दिशा में देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल पेश की है। कंपनी ने तेल विपणन कंपनियों, इथेनॉल उत्पादकों और अन्य उद्योग भागीदारों से इस पहल में शामिल होने का आह्वान किया है।
कंपनी केवल फ्लेक्स-फ्यूल तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। इसमें इलेक्ट्रिक वाहन, मजबूत हाइब्रिड तकनीक और संपीड़ित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) जैसे विकल्प शामिल हैं। ताकेउची ने कहा कि यदि प्राकृतिक गैस का उत्पादन बायोमास से किया जाए तो यह कार्बन-निगेटिव ईंधन बन सकती है। इसी कारण संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) को कंपनी भविष्य के महत्वपूर्ण ऊर्जा विकल्प के रूप में देख रही है।
उन्होंने बताया कि सीबीजी क्षेत्र में रणनीतिक निवेश के तहत नौ संयंत्रों की घोषणा की जा चुकी है, जिनमें से दो पहले ही संचालन शुरू कर चुके हैं। इसके अलावा मारुति सुजुकी हाइड्रोजन ईंधन से जुड़ी अनुसंधान परियोजनाओं पर भी कार्य कर रही है।