नई दिल्ली: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश के 756 मेडिकल कॉलेजों में से सात कॉलेज ऐसे हैं, जहां इंटर्न, जूनियर रेजिडेंट और सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों को स्टाइपेंड का भुगतान नहीं किया जा रहा है। आयोग ने इन संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी कर कार्रवाई शुरू कर दी है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले कs पीठ को एनएमसी की ओर से बताया गया कि 756 स्नातक चिकित्सा कॉलेजों में से 573 कॉलेजों में स्टाइपेंड भुगतान को लेकर कोई विवाद नहीं है। वहीं 176 मेडिकल कॉलेज हाल के वर्षों में स्थापित हुए हैं।
एनएमसी के अनुसार, सात मेडिकल कॉलेजों को स्टाइपेंड नहीं देने के मामले में नोटिस जारी किए गए हैं और जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। एक मेडिकल कॉलेज बंद है, इसलिए वहां कोई इंटर्न नहीं है।
मामले की प्रमुख बातें
756 मेडिकल कॉलेजों में से 573 में स्टाइपेंड भुगतान को लेकर कोई विवाद नहीं।
सात मेडिकल कॉलेजों पर स्टाइपेंड नहीं देने का आरोप।
संबंधित संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी।
एक मेडिकल कॉलेज बंद होने के कारण वहां इंटर्न मौजूद नहीं हैं।
562 कॉलेजों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं और वहां स्टाइपेंड दिया जा रहा है।
दो मेडिकल कॉलेजों में इंटर्न नहीं होने से भुगतान का प्रश्न नहीं उठता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने अधिवक्ता चारु माथुर को नोडल वकील नियुक्त किया। साथ ही सभी पक्षों के वकीलों को निर्देश दिया कि वे मामले से जुड़े सार, चार्ट और दस्तावेज उन्हें उपलब्ध कराएं, ताकि एक समेकित संकलन तैयार कर अदालत के समक्ष रखा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को निर्धारित की है। अदालत ने कहा कि आवश्यक होने पर अगली सुनवाई में आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे। यह मामला मेडिकल स्नातक अभिषेक यादव और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें मेडिकल छात्रों को स्टाइपेंड भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की गई है। गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने पहले कहा था कि सितंबर 2023 में जारी आदेश के तहत अक्टूबर 2023 से इंटर्न को प्रतिमाह 25,000 रुपये स्टाइपेंड देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन उससे पहले के बैच के छात्रों को इसका लाभ नहीं मिला।