एक समय आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट के दौर में सबसे सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने की चमक इस साल फीकी पड़ती नजर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें अपने रिकॉर्ड उच्च स्तर से करीब 25 फीसदी टूट चुकी हैं और यदि यही रुख जारी रहा तो यह 2013 के बाद सोने का सबसे खराब साल साबित हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद निवेशकों का भरोसा सोने से कुछ हद तक कमजोर हुआ है। ऐसे में निवेशकों के सामने बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अब सोने से दूरी बना लेनी चाहिए या गिरावट को निवेश के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
पीक से 25 फीसदी नीचे पहुंचा सोना
अंतरराष्ट्रीय बाजार में साल की शुरुआत में सोना रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था, लेकिन उसके बाद लगातार दबाव में बना हुआ है। हालिया कारोबारी सत्र में स्पॉट गोल्ड में गिरावट दर्ज की गई और यह अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बीते एक सप्ताह में भी सोने की कीमतों में उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली है।
यदि साल के बाकी महीनों में भी यही रुझान बना रहता है तो सोना पिछले 13 वर्षों के सबसे खराब वार्षिक प्रदर्शन की ओर बढ़ सकता है। इससे पहले 2013 में सोने की कीमतों में करीब 28 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।
आखिर क्यों टूट रहा है सोना ?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हुई। हालांकि अब तेल बाजार में नरमी लौटने लगी है और कीमतें अपने उच्च स्तर से काफी नीचे आ चुकी हैं।
महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने के लिए दुनिया के कई केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीति अपनाने की तैयारी में हैं। यूरोप सहित कई अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीद ने सोने पर दबाव बढ़ा दिया है।
जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्प अधिक आकर्षक हो जाते हैं। इसके मुकाबले सोना कोई नियमित आय नहीं देता, जिससे निवेशकों की प्राथमिकता बदलने लगती है।
मुनाफावसूली ने भी बढ़ाया दबाव
विश्लेषकों का कहना है कि पिछले साल सोने ने निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया था। कीमतों में आई तेज तेजी के बाद इस वर्ष बड़ी संख्या में निवेशकों ने मुनाफावसूली की, जिससे बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ गया।
इससे पहले तेजी के दौर में बने सट्टेबाजी वाले कई सौदे भी कमजोर पड़े हैं, जिसका असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
भारतीय निवेशकों को क्यों है थोड़ी राहत ?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट के बावजूद भारतीय निवेशकों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। इसकी वजह रुपये में कमजोरी है। जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो आयातित सोना घरेलू बाजार में उतनी तेजी से सस्ता नहीं होता, जितना अंतरराष्ट्रीय बाजार में दिखाई देता है।
यही कारण है कि वैश्विक गिरावट के बावजूद भारत में सोने की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं।
एक्सपर्ट्स की सलाह: घबराने की जरूरत नहीं
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गिरावट को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार जिन निवेशकों ने पिछले वर्षों में अच्छा लाभ कमाया है, वे आंशिक मुनाफावसूली और पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए तस्वीर अभी भी सकारात्मक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और विविधीकृत पोर्टफोलियो में सोने की अहम भूमिका जैसे कारक भविष्य में इसे समर्थन दे सकते हैं।
क्या करें निवेशक ?
विशेषज्ञों की राय है कि निवेशक जल्दबाजी में सोने से पूरी तरह बाहर निकलने की गलती न करें। यदि कीमतों में और बड़ी गिरावट आती है तो उसे चरणबद्ध निवेश के अवसर के रूप में देखा जा सकता है।
लंबी अवधि के नजरिए से सोना अब भी पोर्टफोलियो में संतुलन और जोखिम प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण साधन माना जा रहा है। इसलिए मौजूदा कमजोरी को केवल संकट नहीं, बल्कि रणनीतिक निवेश अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।