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क्या युद्ध खत्म होते ही देश में ईंधन की 'किल्लत' खत्म हो जाएगी?

केंद्र की ओर से भंडारण की मात्रा बढ़ाने को लेकर कोई खास कदम नहीं उठाया गया है।

नई दिल्ली : गैस सिलेंडर एलपीजी की मांग संभालने में देश की कंपनियां लगभग हांफ रही हैं। प्रशासन की तरफ से एक तर्क दिया जा रहा है कि युद्ध के माहौल में ‘पैनिक-बायिंग’ के कारण ही यह स्थिति बनी है।

हालांकि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी आईईए के विशेषज्ञों का दावा है कि हाल के वर्षों में देश में आम लोगों के दैनिक जीवन में एलपीजी के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए जिस तरह केंद्र सरकार ने पहल की, उसके साथ तालमेल रखते हुए स्ट्रैटेजिक एलपीजी रिजर्व की व्यवस्था नहीं की गई। इसी वजह से अब पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है।

आईईए का कहना है कि भारत का एलपीजी सिस्टम पूरी तरह ऑपरेशनल फ्लो पर आधारित है, जहां स्टॉकपाइलिंग का कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं रखा गया। साथ ही केंद्र के पास इस समय अंडरग्राउंड स्टोरेज की क्षमता बढ़ाने की भी कोई योजना नहीं है।

ऐसे में भविष्य में अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज या किसी अन्य स्रोत से इसी तरह की बाधा पैदा होती है, तो फिर से देश को संकट झेलने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं रहेगा।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011-12 से 2024-25 के बीच भारत में एलपीजी आयात की मात्रा तीन गुना से भी ज्यादा बढ़कर 2 करोड़ टन तक पहुंच गई है। देश की वार्षिक मांग का कम से कम 60 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा होता है। 2015 में जहां एलपीजी आयात पर निर्भरता 47% थी, वहीं अब यह काफी बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद केंद्र की ओर से भंडारण बढ़ाने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया।

2025-26 वित्त वर्ष में इस साल जनवरी तक देश में ईंधन आयात की मात्रा 1.8 करोड़ टन तक पहुंच चुकी थी। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि चालू साल में यह आंकड़ा 2 करोड़ टन के लक्ष्य को पार कर जाता। हर महीने लगभग 30 लाख टन खपत के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। लेकिन देश में भंडारण की जो स्थिति है, उससे मासिक मांग भी पूरी करना संभव नहीं।

दीर्घकालिक स्थिति पर नजर डालें तो भारत में केवल दो भूमिगत भंडार मौजूद हैं — मैंगलोर और विशाखापत्तनम में। इन दोनों की कुल स्टोरेज क्षमता 1.4 लाख टन है। जबकि केवल घरेलू एलपीजी की दैनिक मांग ही लगभग 80,000 टन है। ऐसे में यह भंडार देश की जरूरत कितने दिन पूरा कर पाएंगे, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में भारत के लिए कच्चे तेल से ज्यादा चिंता प्राकृतिक गैस को लेकर है। उनके मुताबिक, इससे एक साथ दो समस्याएं सामने आ रही हैं—कीमतों में वृद्धि और मांग के अनुसार आपूर्ति की कमी।

समस्या की जड़ समझने के लिए एक बात जानना जरूरी है। कच्चे तेल की तरह भारत अपनी वार्षिक प्राकृतिक गैस की मांग का भी बड़ा हिस्सा आयात करता है। प्राकृतिक गैस एक हाइड्रोकार्बन-समृद्ध ईंधन है, जिसका उपयोग लिक्विड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी), लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) और अन्य गैसीय ईंधन बनाने में होता है। साथ ही विदेश से आने वाले कच्चे तेल को रिफाइन करने के दौरान भी कुछ एलपीजी उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।

भारत अपनी वार्षिक जरूरत का 88-89% कच्चा तेल आयात करता है, वहीं 50% प्राकृतिक गैस भी विदेश से आती है। प्राकृतिक गैस से एलपीजी बनाना महंगा और समय-साध्य होने के कारण भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का 60-65% आयात करता है, जिसमें से लगभग 85-90% आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते होती है।

इस रास्ते से बनने वाली वैश्विक सप्लाई चेन को बड़ा झटका लगने के कारण युद्ध के माहौल में भारत में एलपीजी की कीमत काफी बढ़ गई है। यही तर्क परिवहन ईंधन सीएनजी पर भी लागू होता है। भारत सीधे सीएनजी नहीं खरीदता, बल्कि एलएनजी आयात करके उससे सीएनजी तैयार करता है।

दुनिया में भारत वर्तमान में चौथा सबसे बड़ा एलएनजी आयातक देश है। लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान से आता है। युद्ध की स्थिति बनने के बाद क़तर ने उत्पादन बंद कर दिया है। इसी तरह बाकी दो देशों से भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मार्ग बंद होने के कारण एलएनजी की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे सीएनजी की कीमत बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है।

इसके अलावा पहले पांच में शामिल बाकी दो देश हैं संयुक्त राज्य अमेरिका और अंगोला। वहां से आयात बढ़ाने में दो बड़ी समस्याएं हैं। पहली कीमत काफी ज्यादा पड़ेगी। दूसरी उसी मात्रा में गैस लाने में ज्यादा समय लगेगा, जिससे देश में गैस की भारी कमी की स्थिति भी पैदा हो सकती है।

विशेषज्ञ फिलहाल कुछ संभावित परिस्थितियों पर विचार कर रहे हैं। पहली—अगर युद्ध अगले 2-3 दिनों में खत्म हो जाए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से पहले की तरह ईंधन आपूर्ति शुरू हो जाए। ऐसी स्थिति में भी भारत में ईंधन की स्थिति सामान्य होने में कम से कम दो महीने लग सकते हैं।

दूसरी स्थिति—अगर युद्ध 1-2 महीने और चलता है। तब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है, ऐसा दावा नोमुरा और गोल्डमैन सैक्स (goldman sachs) सहित कई विशेषज्ञ संस्थाओं ने किया है।

ऐसी स्थिति में देश में ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में भी भारी गिरावट आ सकती है, ऐसी आशंका अर्थशास्त्री जता रहे हैं।

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