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फाल्गुन पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण का साया, बदला होली का मुहूर्त, भद्रा, सूतक और चंद्रग्रहण के बीच होलिका दहन का निर्णय

2 या 3 मार्च? जानिए होलिका दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त, भद्रा पुच्छ में दहन शुभ: शास्त्रों ने बताया खास समय।

By रजनीश प्रसाद

Feb 27, 2026 12:20 IST

कोलकाता : फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला होलिका दहन इस बार विशेष ज्योतिषीय परिस्थितियों के कारण चर्चा में है। वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को सायं 5:55 बजे प्रारंभ होकर 3 मार्च को सायं 5:07 बजे समाप्त होगी। ऐसे में 2 और 3 मार्च दोनों तिथियों पर मुहूर्त को लेकर विद्वानों में मतभेद दिखाई दे रहा है।

भद्रकाल और दहन की दुविधा

2 मार्च को सायं 5:58 बजे से भद्रकाल प्रारंभ होकर 3 मार्च प्रातः 5:30 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में भद्रा को त्याज्य माना गया है, विशेषकर ‘भद्रा मुख’ (3 मार्च प्रातः 2:35 से 4:30 बजे तक) में शुभ कार्य वर्जित हैं। हालांकि ‘भद्रा पुच्छ’ (3 मार्च प्रातः 1:25 से 2:35 बजे तक) को अपेक्षाकृत अनुकूल माना गया है।

यही कारण है कि कई आचार्य 2 मार्च की रात्रि 1:26 से 2:38 बजे के बीच अर्थात भद्रा पुच्छ काल को सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त बता रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार भद्रा पुच्छ में होलिका दहन करने से अनिष्ट शक्तियों का शमन और समृद्धि का आगमन होता है। इस रात्रि नवपंचम, लक्ष्मीनारायण तथा पंचग्रही योग भी बन रहे हैं, जो शुभ संकेत माने गए हैं।

प्रदोष काल बनाम ग्रहण नियम

कुछ पंचांगों के अनुसार 2 मार्च की प्रदोष बेला (शाम 6:24 से 6:36 बजे) भी मुहूर्त रूप में उपलब्ध है, किंतु यह भद्रा युक्त है। सामान्य नियम से 3 मार्च की प्रदोष बेला में दहन अपेक्षित था परंतु इस वर्ष पूर्ण चंद्रग्रहण होने से ‘ग्रहण नियम’ प्रभावी होगा।

3 मार्च को सूतक काल प्रातः 6:23 बजे से आरंभ हो जाएगा। अतः ब्रह्म मुहूर्त 5:05 से 5:55 बजे तक अथवा 5:30 से 6:23 बजे के बीच दहन का विकल्प बताया गया है। किंतु परंपरा के अनुसार भोर में दहन केवल विशिष्ट परिस्थिति में ही उचित माना जाता है।

चंद्रग्रहण का प्रभाव

3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा पर पूर्ण चंद्रग्रहण घटित होगा। यह ग्रहण भारत सहित एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कई भागों में दिखाई देगा। भारतीय समयानुसार ग्रहण दोपहर 3:20 बजे आरंभ होकर सायं 6:47 बजे समाप्त होगा। भारत में चंद्रमा उदय के समय ग्रहण का अंतिम चरण ही दृश्य होगा।

ज्योतिषीय दृष्टि से यह ग्रहण सिंह राशि के पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में होगा, जो शुक्र से संबंधित है और प्रेम, सौंदर्य तथा वैभव का प्रतीक है। सूतक काल में मंदिर दर्शन और विधिवत पूजन वर्जित रहते हैं; भक्त जप, ध्यान और तुलसी दल से अन्न की शुद्धि जैसे उपाय अपनाते हैं।

निष्कर्ष: कौन सा मुहूर्त चुनें? इस वर्ष तीन विकल्प उपलब्ध हैं—

2 मार्च की संक्षिप्त प्रदोष बेला (भद्रा युक्त),

3 मार्च का ब्रह्म मुहूर्त (सूतक पूर्व),

2 मार्च की रात्रि भद्रा पुच्छ काल (सर्वश्रेष्ठ)।

शास्त्रीय मत के अनुसार भद्रा मुख त्यागकर भद्रा पुच्छ में किया गया दहन सर्वोत्तम माना गया है। रंगवाली होली (धुलेंडी) 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाई जाएगी।

अंततः श्रद्धालु अपने स्थानीय परंपरा और आचार्य के परामर्श से मुहूर्त का चयन करें यही सनातन परंपरा की विशेषता भी है।

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