रूस से लगभग 8000 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर पश्चिम बंगाल के समुद्रतट पर पहुंचा एक नन्हा लेकिन बड़ा ही दिलचस्प मेहमान। दक्षिण 24 परगना जिले के बकखाली पातिबुनिया समुद्रतट पर 'स्पून बिल्ड सैंडपाइपर' पक्षी नजर आ रहा है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि यह नन्हा मेहमान रूस के चुकोटका से उड़कर बंगाल के समुद्रतटीय शहर पहुंचा है। सिर्फ इतना ही नहीं, विशेषज्ञों ने यह भी बता दिया इस पक्षी ने रूस से कब उड़ान भरी थी। पर कैसे?
विशेषज्ञों के मुताबिक रूस से भारत और खासतौर पर बंगाल तक समुद्रतटीय शहर बकखाली तक का सफर तय करने में इस मेहमान को लगभग 8 महीनों का समय लगा है। लंबा सफर तय करके बकखाली पहुंचा यह पक्षी फिलहाल समुद्र के किनारे पर आराम फरमाता नजर आ रहा है। पर इतनी सटीक गणना कैसे हुई?
टैग ने बताया सफरनामा
इस साल 29 मार्च को पहली बार बकखाली के पातिबुनिया समुद्रतट पर 'स्पून बिल्ड सैंडपाइपर' पक्षी को पक्षीप्रेमी संदीप दास ने देखा था। ठीक दो दिन बाद एक अन्य पक्षी प्रेमी को उसी जगह पर ऐसा ही एक और पक्षी नजर आया। इस पक्षी को देखने के बाद ही समझ आया कि इन्होंने कब और कहां से उड़ान भरी होगी।
दरअसल, दूसरे दिन जो 'स्पून बिल्ड सैंडपाइपर' पक्षी दिखाई दिया उसके पैरों में हल्के रंग का एक टैग लगा हुआ था। इसी टैग ने इन पक्षियों का पूरे सफरनामे का राज खोल दिया। विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान में पूरी दुनिया में 500 से भी कम ये पक्षी जीवित हैं।
टैग ने खोला कौन सा भेद?
जिस पक्षी के पैरों में टैग मिला उसपर 'Lime 2K' कोड लिखा हुआ था। इस टैग को देखकर जानकारों को पता चला कि इन दोनों पक्षियों ने 6 जुलाई 2025 को रूस के टूकोटका इलाके से उड़ान भरी थी। इसके बाद पहली बार इन दोनों पक्षियों को कहीं पर देखा गया। इन दोनों प्रवासी पक्षियों ने लंबा सफर तय कर 'ईस्ट एशिया ऑस्ट्रेलियन फ्लाईवे' को पार कर बंगाल तक का सफर पूरा किया।
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस का उत्तर-पूर्व दिशा इन पक्षियों का प्रजनन स्थल है। इन पक्षियों की गतिविधि पर नजर रखने के लिए पैरों में रंगीन टैग लगाया गया है। टैग का रंग जैसा होता है उससे ही पता चलता है पक्षी कौन से वन्य परिवेश में पैदा हुआ है या फिर कैप्टिव ब्रिडिंग हुई है। अगर हल्के हरे रंग का टैग होता है तो माना जाता है कि पक्षी वन्य परिवेश में पैदा हुआ है।
वहीं अगर सफेद रंग का टैग रहता है तो उस पक्षी का जन्म कैप्टिव ब्रिडिंग में हुआ है। पीले टैग का इस्तेमाल उन पक्षियों के लिए किया जाता है जो बीच में रुक कर विश्राम करने के दौरान पकड़े गए हो।
महत्वपूर्ण हैं विरल मेहमान
'स्पून बिल्ड सैंडपाइपर' पक्षियों की निगरानी की जिम्मेदारी एक अंतर्राष्ट्रीयय टास्क फोर्स करती है। पक्षी प्रेमियों द्वारा खींची गयी फोटो से मिली जानकारी से इन पक्षियों की रक्षा में काफी मदद मिलती है। इससे पहले वर्ष 2018 में बंगाल में पहली बार ये पक्षी दिखाई दिए थे। जानकारों का मानना है कि भारत में इन पक्षियों का दिखाई देना किस्मत की बात है। इससे पहले 1996 में तमिलनाडु में एक बार ये पक्षी नजर आए थे। बंगाल के बकखाली समुद्र तट पर इन पक्षियों का आगमन और इनका दिखाई देना पर्यावरणविद काफी अच्छा मान रहे हैं।