प्रयागराजः इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें कथित "राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों" में संलिप्त बताए गए "कॉकरोच जनता पार्टी" नामक संगठन और युवाओं को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल की जांच की मांग की गई थी।
यह मामला न्यायमूर्ति शेखर बी. साराफ और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की अवकाशकालीन पीठ के समक्ष आया। याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर आपराधिक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन) से जुड़े सवाल उठाए, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने स्वयं याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि अमेरिका में रह रहे पुणे मूल के अभिजीत दिपके ने "कॉकरोच जनता पार्टी" नामक एक गैर-पंजीकृत संगठन की स्थापना की है। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह संगठन विदेशी धन के माध्यम से कथित राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल है। इसी आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से विस्तृत जांच कराने की मांग की गई थी।
याचिका में यह भी कहा गया था कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और एक्स जैसे सोशल मीडिया मंचों पर संचालित कई अकाउंट और हैंडल देश के युवाओं को प्रभावित करने और कथित रूप से भड़काने का काम कर रहे हैं। इसके लिए केंद्र सरकार को ऐसे खातों को तत्काल बंद या ब्लॉक करने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका और शपथपत्र में स्वयं को बेंगलुरु का स्थायी निवासी बताया है। अदालत ने टिप्पणी की कि मामला राष्ट्रीय महत्व का हो सकता है, लेकिन ऐसे में याचिकाकर्ता को सबसे पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए था।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिका में उत्तर प्रदेश के भीतर उत्पन्न किसी विशिष्ट कारण या घटना का उल्लेख नहीं किया गया है, जिसके आधार पर लखनऊ पीठ इस मामले की सुनवाई कर सके। पीठ ने संकेत दिया कि उपयुक्त मंच के अभाव (फोरम नॉन कन्वीनियंस) के कारण यह याचिका लखनऊ पीठ के समक्ष विचारणीय नहीं है।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ मौजूदा याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया और याचिकाकर्ता को उचित अदालत में नया मामला दायर करने की छूट प्रदान की।