लखनऊ : उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बेहद चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) का एक जवान यूनिफॉर्म पहनकर हाथ में प्लास्टिक का पैकेट लिए पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय पहुंचा। वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों के सामने उसने पैकेट खोलकर अपनी मां का कटा हुआ हाथ निकाल दिया। यह दृश्य देखकर कार्यालय में मौजूद अधिकारी और कर्मचारी स्तब्ध रह गए।
बताया गया है कि आईटीबीपी जवान का आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही के कारण उसकी मां का दाहिना हाथ काटना पड़ा। इसी शिकायत को दर्ज कराने और कार्रवाई की मांग को लेकर वह अपनी मां का कटा हाथ लेकर सीधे पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गया। घटना के सामने आने के बाद पूरे राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
इस जवान की पहचान विकास सिंह के रूप में हुई है। वह फतेहपुर जिले के अलीमऊ गांव के निवासी हैं और वर्तमान में इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस में तैनात हैं। विकास सिंह के अनुसार, उनकी 56 वर्षीय मां निर्मला देवी सांस लेने में तकलीफ, कमजोरी और कब्ज की समस्या से पीड़ित थीं। सबसे पहले उन्हें महाराजपुर स्थित आईटीबीपी अस्पताल में दिखाया गया। बाद में बेहतर इलाज के लिए कानपुर के एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया।
विकास सिंह का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती करने के बाद उनकी मां को वेंटिलेटर पर रखा गया और वहां गलत इंजेक्शन दिया गया। इसके बाद उनकी मां के हाथ में असामान्य सूजन आने लगी और हाथ का रंग काला पड़ने लगा। स्थिति तेजी से बिगड़ती देख उन्हें दूसरे निजी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। वहां डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण बेहद गंभीर हो चुका है और जान बचाने के लिए दाहिना हाथ काटना ही एकमात्र विकल्प है। इसके बाद 17 मई को ऑपरेशन कर हाथ अलग कर दिया गया।
घटना के बाद विकास सिंह लगातार अस्पताल और डॉक्टरों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करते रहे। उनका कहना है कि वे रेल बाजार थाने भी गए, लेकिन वहां उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। आरोप है कि पुलिस की निष्क्रियता और लगातार उपेक्षा से परेशान होकर उन्होंने यह कदम उठाया।
इसके बाद विकास सिंह अपनी मां का संरक्षित कटा हुआ हाथ लेकर सीधे पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिसके बाद चिकित्सा व्यवस्था और पुलिस प्रशासन दोनों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए रघुबीर लाल ने जांच के आदेश दिए हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को मेडिकल बोर्ड गठित कर पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया गया है। दोनों निजी अस्पतालों के इलाज संबंधी दस्तावेज, उपचार की प्रक्रिया और संक्रमण के कारणों की विस्तृत जांच की जाएगी। साथ ही फॉरेंसिक जांच के भी आदेश दिए गए हैं। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला केवल कथित चिकित्सीय लापरवाही तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आम नागरिकों की मजबूरी और व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास के रूप में भी देखा जा रहा है। एक सुरक्षा बल का जवान जिसे कानून और प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है, यदि अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए इतना कठोर कदम उठाने को मजबूर हो जाए, तो यह पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।