कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का पहला चरण आज 152 सीटों पर मतदान के साथ शुरू हो गया है और इसे पूरे चुनाव का टोन सेट करने वाला दौर माना जा रहा है। 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए हो रहे इस चुनाव में यह चरण इसलिए भी अहम है क्योंकि शुरुआती रुझान ही राजनीतिक हवा का रुख तय करेंगे। करीब 3.60 करोड़ मतदाता, जिनमें 1.75 करोड़ महिलाएं शामिल हैं, अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुकाबले के केंद्र में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress) और चुनौती पेश कर रही भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) हैं, जिनके बीच सीधी और तीखी टक्कर देखने को मिल रही है।
16 जिलों में फैला चुनाव, हर इलाके का अलग समीकरण
पहले चरण की वोटिंग राज्य के 16 जिलों में हो रही है, जहां राजनीतिक समीकरण एक जैसे नहीं हैं। उत्तर बंगाल की 54 सीटें-दार्जिलिंग, कालीमपोंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूचबिहार, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर और मालदा—इस बार ‘निर्णायक जोन’ मानी जा रही हैं। वहीं मुर्शिदाबाद, पूर्व और पश्चिम मिदनापुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम बर्धमान और बीरभूम की 98 सीटों पर भी कड़ा मुकाबला है। चाय बागानों, पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती जिलों और जंगलमहल के सामाजिक समीकरण इस चरण को और जटिल और दिलचस्प बना रहे हैं।
रिकॉर्ड सुरक्षा तैनाती, संवेदनशील बूथों पर सख्त निगरानी
मतदान को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं। पूरे राज्य में 2,450 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं, जबकि 8,000 से ज्यादा मतदान केंद्रों को ‘अत्यंत संवेदनशील’ श्रेणी में रखा गया है। हर कंपनी में करीब 75 जवान तैनात हैं, जिससे साफ है कि प्रशासन किसी भी तरह की गड़बड़ी को लेकर सतर्क है।
मुद्दों की गर्मी: भ्रष्टाचार से लेकर सुरक्षा तक
इस बार चुनावी माहौल सिर्फ विकास की बातों तक सीमित नहीं है। भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले (‘कैश-फॉर-जॉब्स’), महिलाओं की सुरक्षा, घुसपैठ और आदिवासी असंतोष जैसे मुद्दे बहस के केंद्र में हैं। इन विषयों ने चुनाव को हाई-वोल्टेज बना दिया है और मतदाताओं के फैसले पर सीधा असर डाल सकते हैं। राजनीतिक दल इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
91 लाख वोटर हटे-चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर
चुनाव से पहले हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिसने सियासी बहस को और तेज कर दिया है। माना जा रहा है कि हटाए गए मतदाताओं में बड़ी संख्या अल्पसंख्यक समुदाय की है। तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress) इसे मताधिकार छीनने की कोशिश बता रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) इसे घुसपैठ के खिलाफ जरूरी कदम के रूप में पेश कर रही है। इस मुद्दे का असर कई सीटों पर देखने को मिल सकता है।
उत्तर बंगाल: सत्ता की चाबी या सियासी जोखिम?
पहले चरण में उत्तर बंगाल सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ बनकर उभरा है। 2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां से बड़ी मजबूती मिली थी। अगर इस बार भी पार्टी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखती है, तो उसके लिए सत्ता की राह आसान हो सकती है। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के नेतृत्व वाली टीएमसी के लिए इस इलाके में वापसी बेहद जरूरी है, ताकि राज्यभर में मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाई जा सके।
दिग्गज मैदान में, नंदीग्राम पर सबकी नजर
पहले चरण में कई बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है। शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) नंदीग्राम से फिर चुनावी मैदान में हैं, जहां उन्होंने 2021 में बड़ा उलटफेर किया था। इसके अलावा दिलीप घोष (Dilip Ghosh), अधीर रंजन चौधरी (Adhir Ranjan Chowdhury) और टीएमसी के गौतम देव भी चर्चा में हैं। नंदीग्राम सीट इस बार भी प्रतीकात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद अहम बनी हुई है।
बड़े दावे, कड़ी चुनौती
राजनीतिक दलों ने इस बार बड़े लक्ष्य तय किए हैं। टीएमसी 2021 के अपने 214 सीटों के आंकड़े को पार करने की बात कर रही है, जबकि भाजपा 170 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही है। पहले चरण के मतदान के बाद सामने आने वाले रुझान इन दावों की सच्चाई का पहला संकेत देंगे।
अब नजर दूसरे चरण पर
पहले चरण के बाद राज्य की बाकी 142 सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होगा। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहले चरण का असर दूसरे चरण के मतदान पैटर्न पर भी साफ दिखाई देगा। पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ यह चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की निर्णायक लड़ाई है। उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक, हर सीट पर कड़ा मुकाबला है और हर वोट सत्ता की तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।