নयी दिल्लीः पश्चिम बंगाल समेत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि रिकॉर्ड को आधुनिक, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में ‘स्वामित्व योजना’ बड़ा परिवर्तन साबित हो रही है। ड्रोन आधारित सर्वेक्षण और डिजिटल मैपिंग के माध्यम से गांवों की जमीन को कानूनी पहचान मिल रही है, जिससे देशभर में लगभग 135 लाख करोड़ रुपये मूल्य की ग्रामीण संपत्ति आर्थिक रूप से सक्रिय हो रही है। इसके साथ ही, प्रॉपर्टी कार्ड के आधार पर 1,679 करोड़ रुपये से अधिक के 10,900 से ज्यादा ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिससे ग्रामीण परिवारों की संस्थागत वित्त तक पहुंच तेजी से बढ़ी है।
यह जानकारी भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद द्वारा किए गए प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन में सामने आई, जिसे विश्व बैंक का समर्थन प्राप्त था।
अध्ययन के अनुसार योजना के तहत करीब 3.30 लाख गांवों का डिजिटल मानचित्रण किया गया है, जो लगभग 70,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है। साथ ही 1.89 लाख गांवों में 3.14 करोड़ से अधिक प्रॉपर्टी कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इससे पहले अनौपचारिक मानी जाने वाली ग्रामीण आबादी की जमीन अब कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त और बैंकिंग योग्य संपत्ति में बदल गई है, जिससे लाखों लोग औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में शामिल हुए हैं।
इन उपलब्धियों को पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज ने ‘विश्व बैंक भूमि और संपत्ति अनुसंधान सम्मेलन-2026’ में अपने वर्चुअल संबोधन के दौरान रेखांकित किया। यह सम्मेलन 29 अप्रैल से 1 मई तक वॉशिंगटन स्थित विश्व बैंक मुख्यालय में आयोजित किया जा रहा है।
सम्मेलन के एक सत्र में विश्व बैंक समूह में प्रमुख अर्थशास्त्री क्लाउस डीनिंगर ने ‘स्वामित्व योजना का मूल्यांकन’ विषय पर अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत किए। इसके अलावा ‘क्रेडिट इम्पैक्ट्स ऑफ टाइटलिंग रूरल हैबिटेशन लैंड: एविडेंस फ्रॉम इंडिया’ज़ स्वामित्व स्कीम’ शीर्षक शोध पत्र भी पेश किया गया, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण पहुंच बढ़ाने में योजना की भूमिका को प्रमुखता से बताया गया।
साल 2020 में शुरू की गई स्वामित्व (सर्वे ऑफ विलेजेस एंड मैपिंग विद इम्प्रोवाइज्ड टेक्नोलॉजी इन विलेज एरियाज) योजना ड्रोन सर्वे, जीआईएस मैपिंग और सामुदायिक भागीदारी के जरिए ग्रामीण आबादी क्षेत्रों में संपत्ति के कानूनी स्वामित्व का रिकॉर्ड तैयार करती है। इससे भूमि विवाद कम होते हैं और भूमि प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि योजना ने ग्रामीण ऋण और वित्तीय समावेशन को मजबूत किया है। मध्य प्रदेश में स्वामित्व सर्वे से जुड़ी आवासीय संपत्तियों पर मिलने वाले ऋण की राशि प्रति भूखंड सालाना 22,000 रुपये से अधिक बढ़ी है। वहीं महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में कुल ऋण उठाव में करीब 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह विश्लेषण भारतीय रिजर्व बैंक के सहयोग से किया गया।
स्थानीय निकायों के स्तर पर भी योजना के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। प्रॉपर्टी कार्ड वितरण के बाद ग्राम पंचायतों के संपत्ति कर राजस्व में 4.71 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि कुल स्व-स्रोत राजस्व में 4.08 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया। इससे पंचायतों की वित्तीय स्थिति मजबूत होने के संकेत मिले हैं।
भूमि प्रबंधन के क्षेत्र में भी औपचारिकता बढ़ी है। आवासीय संपत्तियों के पंजीकृत म्यूटेशन में सालाना 6.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि कृषि भूमि के म्यूटेशन में 4.87 प्रतिशत की कमी आई है। इससे भूमि उपयोग के पैटर्न अधिक स्पष्ट हुए हैं और अनौपचारिक या विवादित लेन-देन में कमी आई है।
अधिकारियों के अनुसार ड्रोन सर्वे, जमीनी सत्यापन और सामुदायिक पुष्टि के संयुक्त मॉडल ने संपत्ति विवादों को कम करने और स्वामित्व रिकॉर्ड पर लोगों का भरोसा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
योजना के तहत जारी प्रॉपर्टी कार्ड कानूनी दस्तावेज के रूप में काम करते हैं, जिन्हें गिरवी रखकर ग्रामीण परिवार पहली बार औपचारिक वित्तीय संस्थानों से ऋण प्राप्त कर पा रहे हैं। पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में इस योजना के विस्तार से भूमि रिकॉर्ड की पारदर्शिता बढ़ने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।