इस्लामाबाद : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पाकिस्तान पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ऊर्जा आयात पर निर्भर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद कैबिनेट बैठक में स्वीकार किया कि देश पर आर्थिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले जहां पाकिस्तान हर हफ्ते लगभग 300 मिलियन डॉलर तेल आयात पर खर्च करता था अब यह बढ़कर करीब 800 मिलियन डॉलर हो गया है।
इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव के कारण आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जिससे कीमतें चार साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं।
पाकिस्तान जैसे देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं उनके लिए यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है। देश पहले से ही सीमित भंडार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद पर निर्भर है ऐसे में चालू खाता घाटा बढ़ने का खतरा और गहरा गया है।
इसका असर आम लोगों पर भी पड़ रहा है। ईंधन महंगा होने से बिजली उत्पादन लागत बढ़ती है जिससे बिजली बिल में वृद्धि होती है। साथ ही परिवहन खर्च बढ़ने से रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ते हैं जिससे महंगाई और तेज हो जाती है। पाकिस्तान पहले से ही ऊंची महंगाई से जूझ रहा है ऐसे में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
हालांकि इस संकट के बीच पाकिस्तान कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय रहने की कोशिश कर रहा है। शहबाज शरीफ ने बताया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू कराने में भूमिका निभाई है। इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच करीब 21 घंटे तक बैठक हुई और आगे भी बातचीत जारी रखने की योजना है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संघर्ष को लेकर चिंता बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि इस युद्ध के कारण दुनिया भर में 3 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी की चपेट में आ सकते हैं।
वहीं ईरान के अंदर भी आर्थिक दबाव बढ़ रहा है जहां मुद्रा में गिरावट और बाजार में अस्थिरता देखी जा रही है। इसका असर पड़ोसी देशों खासकर पाकिस्तान पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ जैसी है जहां तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी मुद्रा संकट, राजनीतिक अनिश्चितता और वैश्विक दबाव एक साथ असर डाल रहे हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो सरकार को सब्सिडी घटाने, टैक्स बढ़ाने या नए कर्ज लेने जैसे कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं।
कुल मिलाकर अमेरिका-ईरान संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। पाकिस्तान इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल है और हालात जल्दी सामान्य होने की संभावना फिलहाल कम नजर आ रही है।