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दहेज उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी-शादी का मतलब लड़की और उसके परिवार को अपमानित करने का अधिकार मिल जाना नहीं'

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि बहू और उसके परिवार का इस तरह अपमान करना अब नहीं चलेगा।'

By लखन भारती

May 29, 2026 18:28 IST

नयी दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने पति की तरफ से पत्नी के परिवार को अपमानित किए जाने को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। महिला की संदिग्ध मौत से जुड़े छत्तीसगढ़ के एक मामले में दोषी ठहराए गए देवर की याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समाज को आइना दिखाया। जजों ने लड़की के परिवार से पैसों और उपहार की उम्मीद को बहुओं को 'निचोड़ने' की कोशिश करार दिया।

मामला 2010 का है। छत्तीसगढ़ में शादी के सिर्फ तीन साल के भीतर एक महिला ने फांसी लगाकर जान दे दी थी. महिला के परिवार ने आरोप लगाया कि कार और कैश की मांग को लेकर बेटी को प्रताड़ित किया जा रहा था। मौत शादी के सात साल के भीतर अप्राकृतिक रूप से हुई थी इसलिए, कोर्ट ने इसे कानूनन 'दहेज मृत्यु' की श्रेणी में माना।

मामले में पति के परिवार के कई सदस्यों को आईपीसी की धारा 304B (दहेज मृत्यु), धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 498A (दहेज उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने जिस याचिका पर शुक्रवार (29 मई, 2026) को सुनवाई की उसे मृतक महिला के देवर ने दाखिल किया था। उसे निचली अदालत ने दहेज उत्पीड़न का दोषी माना था।

मामले की सुनवाई के दौरान केस के तथ्यों का हवाला देते हुए जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा, 'लड़के के परिवार ने लड़की के परिवार को कहा कि तुम लोग भिखारी हो. तुम पैसे नहीं दे सकते। लड़की का परिवार अपनी बेटी को बचाने की भीख मांग रहा था और उन्हें भिखारी कहा जा रहा था। दुल्हन के पिता ने कहा था कि वह 60 हजार रुपए दे सकते हैं और आप उन्हें भिखारी कहते हैं ?'

लड़की के परिवार को अपमानित करने की प्रवृत्ति पर सख्त नाराजगी जताते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'लड़के, लड़कियों से शादी करके उन्हें और उनके परिवार को अपमानित क्यों करते हैं ? समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि बहू और उसके परिवार का इस तरह अपमान करना अब नहीं चलेगा।'

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर केवल धारा 498A (उत्पीड़न) का आरोप है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, 'आपको खुश होना चाहिए कि उन्हें सिर्फ 3 साल की सजा मिली है।' बेंच के सदस्य जस्टिस भुइयां ने शिक्षित परिवारों में ऐसी बुरी प्रथा के बने रहने पर चिंता जताई।

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