नई दिल्ली : देश में आवश्यक दवाओं और टीकों की बढ़ती कीमतों को लेकर स्वास्थ्य क्षेत्र में चिंता बढ़ने लगी है। केंद्र सरकार ने टीकों की निरंतर उपलब्धता और उत्पादन व्यवस्था को बनाए रखने का हवाला देते हुए बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल तीन महत्वपूर्ण टीकों - बीसीजी, खसरा (मीजल्स) और मीजल्स-रूबेला (एमआर) वैक्सीन की अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) बढ़ाने का फैसला किया है। इस निर्णय के बाद विशेषज्ञों के एक वर्ग ने आशंका जताई है कि भविष्य में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च और बढ़ सकता है।
हाल ही में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने एंटी-टिटेनस इम्यूनोग्लोब्युलिन इंजेक्शन की कीमत बढ़ाने की अनुमति दी थी। इसके कुछ ही दिनों बाद बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े तीन प्रमुख टीकों की कीमतों में भी वृद्धि की घोषणा की गई है।
एनपीपीए की नई अधिसूचना के अनुसार, बीसीजी वैक्सीन की प्रति डोज (0.1 मिलीलीटर) की अधिकतम कीमत 8.20 रुपये से बढ़ाकर 9.89 रुपये कर दी गई है। इसी तरह एमआर वैक्सीन की प्रति वायल कीमत 72.90 रुपये से बढ़कर 87.93 रुपये हो गई है। वहीं खसरा (मीजल्स) वैक्सीन की प्रति वायल कीमत 51.40 रुपये से बढ़ाकर 62 रुपये निर्धारित की गई है। तीनों मामलों में कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
केंद्र सरकार का कहना है कि यह निर्णय वर्ष 2013 के ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) के तहत प्राप्त विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए लिया गया है। सरकार के अनुसार, उत्पादन लागत में वृद्धि और बाजार में टीकों की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम जरूरी था। सूत्रों के मुताबिक एक वैक्सीन निर्माता कंपनी द्वारा पुनर्विचार आवेदन दिए जाने के बाद पुरानी मूल्य सीमा की समीक्षा कर नई कीमतें तय की गईं।
हालांकि जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम पर सीधा असर नहीं पड़ेगा। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चों को ये सभी टीके पहले की तरह निःशुल्क उपलब्ध रहेंगे। लेकिन निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों में टीकाकरण कराने वाले अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था को बनाए रखना आवश्यक है लेकिन लगातार आवश्यक दवाओं और टीकों की कीमत बढ़ने की प्रवृत्ति निजी स्वास्थ्य सेवाओं को और महंगा बना सकती है। यही वजह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र के कई जानकार इस फैसले पर नजर बनाए हुए हैं।